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Tuesday, November 28, 2017

क्यों देखनी चाहिए पंचलैट - स्मिता गोयल एवं यतीश कुमार



पंचलैट -  साहित्य को सिनेमा को करीब
लाने का एक साहसिक प्रयास
स्मिता गोयल
यतीश कुमार

आंचलिक भाषा और हिंदी साहित्य के अमर कथा शिल्पी फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी पंचलाइट पर बनी फिल्म 'पंचलैट' १७ नवम्बर २०१७ को भारतीय सिनमा के पटल पर अपनी एक नई छाप छोड़ने आ गयी। पंचलैट शब्द अपभ्रंश है पंचलाइट का, जिसे पेट्रोमेक्स कहते हैं।

निर्देशक प्रेम प्रकाश मोदी  ने एक असाधारण प्रयास किया है साहित्य और सिनेमा जगत को जोड़ने का। इस फिल्म में संगीत-कल्याण सेन का है। इसके गीत मधुर और कर्णप्रिय हैं जो पुराने दिनों के गानों की झलक देते हैं। रंगमंच के दिग्गज कलाकारों ने मिलकर इस फ़िल्म में चार चाँद लगा दिया हैं। अमितोष नागपाल व अनुराधा मुखर्जी मुख्य भूमिका में हैं। इनके अलावा यशपाल शर्मा, राजेश शर्मा, रवि झंकाल, ब्रिजेन्द्र काला, कल्पना झा, वीरेन्द्र सक्सेना, प्रणय नारायण, इकबाल सुलतान, सुब्रत दत्त, ललित परीमू,  अरूप जागीरदार, मालिनी सेनगुप्ता, पुण्यदर्शन गुप्ता,अरुणिमा घोष की भी अहम भूमिकाएं हैं और हर एक ने अपने किरदार के साथ पूरा न्याय किया है। किरदार भी ऐसे जो आपको परदे पर यथार्थ का दर्शन करा रहे हों। नायक राजकपूर की आवारा फ़िल्म से बहुत प्रभावित है और राजकपूर की नक़ल की कोशिश करता है। अमितोष ने बहुत ही सहज रखा है इस नक़ल को भी ,कहीं भी सीमा नहीं लांघी है और एक नयापन दिया है राजकपूर की झलक को जो देखने में सहज लगती  है । फिल्म देखकर समझा जा सकता है कि इस कलाकार ने कितनी तपस्या की होगी इसे साधने में। हम व्यक्तिगत तौर पर उनके क़ायल हो गये। नायिका के रूप में अनुराधा मुखर्जी ने भी पूरा साथ दिया है प्रेम की सरलता और विरलता को दर्शाने में।

संवाद जितने सधे और  सटीक लगते हैं उतनी ही अच्छी टाइमिंग है सभी कलाकारों की। टीम एफ़र्ट साफ़ झलकता है सधी हुई अदायगी में । रास लीला के दृश्य हों या महतो मित्रों की असाधारण जुगलबंदी - सारे के सारे दृश्य प्रशंसनीय हैं।

नायक का सब्जी पकाना और दोस्त के लिए चार आलू बचा के रखना हमें सरलता और मित्रता की पुरानी गली में ले जाता है। पुराने गाने जैसे-" दम भर तो उधर मुँह फेरे ओ चंदा " हो या " हम तुमसे मोहब्बत कर के सनम ", इनका बख़ूबी उपयोग मनोरंजन और दृश्य की सार्थकता के लिए  नपे- तुले अन्दाज़ में किया गया है। 1954-60 के बीच के समयकाल को बहुत ही सूझ बूझ के साथ वास्तविकता की परत लगाए आपके सामने प्रस्तुत किया गया है। इस फ़िल्म पर लिखते समय हमारे मन में कुछ सवालों ने दस्तक दी कि पंचलेट फिल्म दर्शक आख़िर क्यों देखे?
तो जनाब जवाब जो हमने पाया - वह प्रस्तुत है:-


अगर आप शुद्ध मनोरंजन चाहते हैं।
अगर आप अपने गांव को फिर से जीना चाहते हैं।
अगर आप एक सहज और परिपक्व अदाकारी देखना चाहते हैं।
अगर आप टीम की  ताकत और समर्पण देख गदगद होना चाहते हैं।
अगर आप सच और प्यार की जीत देखना चाहते हैं।
अगर आपको साहित्य कला कहानियों से थोड़ा-सा भी लगाव रहा है।
अगर आप कभी जातिवाद से जूझे हों थोड़ा भी।
अगर आप में गाँव की मिट्टी की खुशबू पाने की ललक अब भी बाकी हो ।
अगर आप एक निर्देशक को जिसने अपने 9 साल इस फ़िल्म पर लगा दिए और उसके संघर्ष को  समझने का हौसला रखते हैं।
अगर आप समझना  चाहते हैं कि निर्माता ने इस टीम और कहानी पर पैसा क्यों लगाया?
अगर आप मन में प्रसन्नता, शांति और चित्त में मनोरंजन की तृप्ति चाहते हैं।

तो आप जरूर देखेंगे एक संपूर्ण मनोरंजक और ज़मीन से जुड़ी फिल्म पंचलैट।
अच्छी फिल्म कितनी बार भी देखिये आपका मन नहीं भरता। हमने ये फ़िल्म दो बार देखी। सच जानिये पहली बार जितनी अच्छी लगी दोबारा और ज्यादा अच्छी लगी। कहानी, अभिनय,संगीत ,निर्देशन ,सिनेमाटोग्राफी,संवाद हर किसी ने अपना काम और ज़िम्मेदारी बख़ूबी निभाया है ।
प्रेम मोदी मुबारकबाद के हक़दार हैं इतनी बेहतरीन फिल्म हमारे बीच लाने का साहसिक कार्य करने के लिए। कहते हैं न कि जो चीज आपको बहुत ज़्यादा पसंद हो उसे पाने और देखने की लालसा और बढ़ जाती है। यही हाल हमारे जैसे उन सभी दर्शकों का है जिन्होंने 'पंचलैट'कहानी को पहले पढ़ा है। मैथिल भाषा और कोसी परिवेश की आंचलिकता को पृष्ठभूमि में रखकर इस फ़िल्म में कहानी को सजीव करने का सफल प्रयास किया गया है।

यह फिल्म गांव की परिस्थिति व तात्कालीन सामाजिक वर्जनाओं तथा मुनरी और गोधन की प्रेमकथा पर आधारित है। यह एक ऐसी फ़िल्म है जो उस ज़मीनी हक़ीकत को दिखाती है जो आज भी बिलकुल नहीं बदली है, वही जात -पात , टोला में बंटा हुआ वही समाज का छोटा स्वरूप और देहात में रहने वालों के तौर तरीक़े जिसे बड़े सहज भाव व शालीनता से दर्शाती है पंचलैट। दशकों बाद भी कुछ नहीं बदला है,सब वहीं का वहीं है। रेणु की कहानियों में गाँव की परिकल्पना कोरी कल्पना नहीं है। आज भी पंचलैट की तरह सुदूर उत्तर या दक्षिण बिहार के गाँवों में सलीमा के गाने को कोई गोधन किसी मुनरी को देखकर गाने की मजाल नहीं कर सकता और मजाल कर ले तो वही हश्र होगा जो इस सिनमा में दिखाया गया है। जिसमें वही कौतुहल आज भी है। और सच बताएँ तो यह फ़िल्म आपको आपके बचपन जवानी की एक रोचक सैर कराते हुए यथार्थ तक लाती है।
ज़रूरत है आज इस फ़िल्म को सभी छोटे-बड़े शहरों के सिनेमाघरों और सभी मल्टीप्लेक्स में देखे और दिखाए जाने की ।

काश! यह फ़िल्म जल्द ही वैसे सभी दर्शकों तक पहुँचे जो कड़वे यथार्थ को नहीं पचा पाते हैं। भारत जैसे देश में बात भले ही बुलेट ट्रेन की हो रही है पर शहरों में भागती दौड़ती ज़िन्दगी ने संवादहीनता की जो रेस लगा रखी है  उसका समाधान कुछ हद तक पंचलैट भी है।
सिलेमा के गाने गाता हुआ गोधन और मुनरी के पवित्र प्रेम को उस सदी में मान्यता देती यह कहानी और फ़िल्म आज के युग में अपने दावे के पुरज़ोर समर्थन की माँग निश्चित ही आपसे करेगी।
निराशा को आशा में बदलती है यह फ़िल्म जहाँ एक सुखान्त के साथ आज की दिखावटी दुनिया को आइना दिखाती है वहीं बहुत सारे सवाल भी छोड़ जाती है हम सब के लिए कि इतने विकास के बावजूद हम १९५४ -५५ में ही क्यों खड़े हैं । देश के कई हिस्सों में कुछ क्यों नहीं बदला है। साथ ही और भी बहुत से जहनी सवाल।

आज के हालात देख लग रहा है जैसे यथार्थपूर्ण कहानी को भी  किसी भव्यता का मोहताज़ होना पड़ रहा हो। आधुनिक युग में कला को पीछे धकेल वित्त विभूतियों की दख़ल और रंगभूमि पे अपनी प्रभुता काबिज होने की मुहिम ज़्यादा प्रतीत हो रही है। एक षड्यंत्र लग रहा है मौलिक व कलात्मक कार्य के विरुद्ध। रेणु जी का साहित्य जिस तरह की आंचलिकता के सौंदर्य से ओतप्रोत दिखता है, इस फिल्म में भी उसे वैसा ही बनाए रखने का प्रयास किया गया है, जो दर्शकों के लिए एक अलग अनुभव होगा।

फिल्म से जुड़ी कलाकार कल्पना झा का कहना है कि कई सालों से थिएटर से जुड़ी हूं पर फिल्म का यह पहला अनुभव है। फिल्म से जुड़ना और वह भी साहित्यिक फिल्म में काम करने का अलग ही आनंद है। बचपन से रेणु जी की कहानियों से प्रभावित रही हूं ऐसे में उनकी कहानी पर बनी फिल्म में अभिनय करना सचमुच कल्पना से परे है।

अच्छी कहानियों को जीवंत करने के लिए उनका गंभीर फिल्मांकन बेहद जरूरी है। गौरतलब है कि रेणु  की कहानी मारे गये गुलफामपर बॉलीवुड के गीतकार शैलेंद्र ने तीसरी कसमफिल्म 1966 में बनायी थी।  तीसरी क़सम के बाद आज पंचलैट को एक सार्थक प्रयास माना जा सकता है जिसने कम से कम एक शुरुआत तो ज़रूर की है साहित्य और सिनेमा की कड़ी को जोड़ने की। यह फ़िल्म प्रेरित करेगी हर उस कथाकार को, जिसके अंदर का साहित्यकार और कलाप्रेम दोनो ज़िंदा है,कुछ नया करने के लिए।

विश्वास है कि पंचलैट अपनी पूरी चमक-दमक के साथ जलती रहेगी और अपनी अमिट छाप छोड़ने में कामयाब रहेगी।

समीक्षकद्वय-
स्मिता गोयल

यतीश कुमार












हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

Wednesday, October 25, 2017

रामलीला पर विमलेन्दु का रोचक लेख



          पथरीले समय में ऐसे आता था त्रेतायुग !

विमलेन्दु          

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यह उन दिनों की बात थी जब देश में दूरदर्शन नहीं था और सिनेमा की पहुँच भी केवल महानगरों तक ही थी. हमारी कलात्मक अभिरुचियाँ फाग, नाच और लीला जैसे कलारूपों में प्रकट होती थीं. कला-प्रदर्शन का कोई व्यावसायिक प्रयोजन नहीं होता था. कला, हमारे सुख-दुख, राग-विराग, मोह-माया के प्रकटीकरण का एक माध्यम थी. कला, हमारी सामूहिकता और सहकारिता को व्यक्त करने वाली एक स्वत: साध्य विद्या थी. यह वो समय था जब कोई व्यक्ति अभिनय कर ले, नाच ले, गा ले, चित्र बना ले तो इसे उस व्यक्ति की विशिष्ट विद्या कहा जाता था. यहाँ तक कि तवायफों के नाच-गाने की भी बड़ी इज़्ज़त थी. सम्पन्न लोगों के यहाँ होने वाले उत्सवों में मशहूर तवायफें पालकी भेजकर और नज़राना पेश कर बुलाई जाती थीं.

यह उन दिनों की बात है जब सामूहिक मनोरंजन का एक बहुत बड़ा माध्यम हुआ करती थी रामलीला. रामलीला सिर्फ मनोरंजन ही नहीं, नैतिक शोधन का साधन भी थी. यह फटेहाल और दरिद्र समाज में रामराज्य का सपना दिखाकर मरहम भी लगाती थी तो हम सब के भीतर देवत्व का कुछ अंश है, ऐसा सात्विक बोध भी जगाती थी. जिन लोगों के भीतर कला के बीज दबे होते थे, रामलीला उन्हें अंकुरित करती थी. और रामलीला उनकी कला को पल्लवित, पुष्पित भी करती थी. मेहनत-मजूरी और किसानी के दुर्दम्य संघर्षों से जूझते लोगों को रामलीला एक ऐसे मनोजगत में ले जाती थी, जहाँ सुख और शान्ति का एक विरल मौसम होता था. कुछ देर के लिए ही सही वो उस दुनिया में पहुँच जाते थे जहाँ सूखा, अतिवृष्टि, कालरा और जमींदारों के चाबुक नहीं दिखाई पड़ते थे. यह वो जगह होती थी जहाँ राम-लक्ष्मण की लीलाओं के साथ हमारे भीतर की वेदनाओं और संवेदनाओं को एक अनन्त और वस्तुनिष्ठ विस्तार मिलता था.

यह उन दिनों की बात है जब मैं आठ-दस बरस का बालक था और किशोरावस्था को मुझ पर आने की कुछ हड़बड़ी सी थी. उस समय दशहरा से दीवाली तक स्कूलों में पचीस दिन की फसली छुट्टी होती थी. यह ऐसा मौसम होता था जब गांवों का सौन्दर्य अपने शिखर पर होता है. खलिहान में रखे धान के गट्ठरों से मदहोश कर देने वाली खुशबू हवा के झोंकों के साथ घरों में घुस आती थी. झाड़ियों में रंग-बिरंगे फूल और उन पर मंडराती तितलियाँ मन हर लेती थीं. सुबह घास पर बिखरी हुई ओस और शाम की लालिमा में पसरी हुई आस ! इसी खुशगवार दृश्य में हम शामिल होते थे अपने गांव में जब हमारा परिवार नजदीकी कस्बे से फसली छुट्टी में घर आता था. हम लोगों की दशहरा दीवाली गाँव में ही होती थी.

और इसी समय गांव में आती थी रामलीला मंडली. गांव से थोड़ा हटकर एक बहुत बड़ा सामूहिक बगीचा था. यह गांव का श्मशान भी था. गांव के मृतकों का अंतिम संस्कार यहीं होता था इसलिए डरावना भी था, खासतौर से बच्चों के लिए. रामलीला मंडली यहीं अपना डेरा जमाती थी. यहीं उनका मंच सजता था. विचित्र बात थी कि जिस बगीचे में दिन में भी जाने से लोग डरते थे, वही बगीचा पन्द्रह बीस दिनों के लिए स्वर्ग बन जाता था. तब गांव में बिजली नहीं थी. आस पास के किसी गांव में नहीं. रात में इन दिनों यह श्मशान ऐसे लगता था जैसे अँधेरे के समुद्र में रौशनी का कोई टापू हो. रामलीला मंडली पन्द्रह बीस दिनों तक इसी बगीचे में रामलीला का मंचन करती थी. मेरा गांव जाने का सबसे बड़ा लोभ यही रामलीला थी. मैं साल भर इस छुट्टी का इंतज़ार करता था. रामलीला के प्रति मेरी दीवानगी तब से थी जबसे मैनें होश सम्भाला. जब मैं तीन-चार साल का था, तब से मेरे भीतर रामलीला की स्मृतियाँ और संस्कार हैं. उस समय दशहरे की छुट्टियों में मैं अम्मा के साथ ननिहाल जाता था. इलाहाबाद से लगा हुआ एक बड़ा सा जीवन्त कस्बा है त्यौंथर. यही मेरा ननिहाल है. टमस नदी की भीट पर बसा यह कस्बा बहुरंगी और कला सम्पन्न है. यहाँ की रामलीला बहुत प्रसिद्ध थी. मेरे मामा का पूरा घर कई पीढ़ियों से रामलीला में अभिनय करता था. मामा लोग चूँकि ब्राह्मण थे और सुदर्शन थे, तो राम-लक्ष्मण-भरत-सीता और ऋषियों की भूमिकाएँ .यही लोग निभाते थे. जिन दिनों की मुझे याद है, उस समय मेरे नाना, विश्वामित्र और परशुराम बनते थे. बड़े मामा राम और छोटे मामा लक्ष्मण. परशुराम-लक्ष्मण का झगड़ा हम लोगों को इसलिए भी ज्यादा मज़ेदार लगता था कि नाना और मामा लड़ रहे होते थे. बाद मे दोनो जन घर आकर भी लड़ते थे. इन लोगों को खूब इनाम भी मिलते थे अभिनय पर. खासतौर से धनुषयज्ञ के दिन छोटे मामा लक्ष्मण, परशुराम से संवाद पर खूब ईनाम बटोरते थे. बाद में हम सब बच्चे उनसे पैसे छुड़ा लेते थे. उन्हीं दिनों से मुझे रामलीला के अधिकतर संवाद याद हो गए थे. ये संवाद राधेश्याम कृत रामायण के होते थे.

बाद में जब हमारे गांव में रामलीला मंडली आने लगी तो मानों मेरी मुराद पूरी हो गई. तब तक ननिहाल जाने का सिलसिला भी कुछ कम हो गया था. फसली छुट्टी में अम्मा अगर मायके जाती भी, तो मैं गांव की रामलीला के लोभ में नहीं जाता था. लगभग पन्द्रह बीस दिनों तक रामलीला चलती थी. और कभी कभी लोगों की फरमाइश पर कुछ प्रसंग दुबारा मंचित किए जाते थे. खासतौर से धनुषयज्ञ और लक्ष्मण मेघनाद युद्ध के प्रसंग सबसे ज्यादा हिट होते थे. रामलीला मंडली गांव वालों से कोई शुल्क नहीं लेती थी. गांव वालों को सिर्फ उनके रोज़ के भोजन का इन्तज़ाम करना होता था. गांव के सम्पन्न लोग अलग-अलग दिन के भोजन का जिम्मा बड़ी श्रद्धा और गर्व के साथ उठा लेते थे.

शाम लगभग सात बजे लीला शुरू होती थी. दूसरे लोग इसी समय के आसपास लीला स्थल पर पहुँचते थे. मुझे इतनी उतावली होती थी कि मैं शाम पाँच बजे ही एक छड़ी और अपने बैठने के लिए बोरिया लेकर चल देता था. सबसे आगे मेरी ही बोरी बिछती थी. जब में वहाँ पहुँचता उस वक्त कलाकारों का श्रृंगार चल रहा होता था. रामलीला के सभी कलाकार पुरुष होते हैं. कोई चड्डी-बनियान में, कोई तौलिया लपेटे बैठा मुह पर मुर्दाशंख पोतवा रहा होता. किसी के चेहरे पर लाल-पीली-काली टिप्पियाँ बनाई जा रही होतीं. हनुमान जी अपनी पूँछ को दुरुस्त कर रहे होते. रावण पेट्रोमैक्स में बत्ती लगा रहा होता. समय से बहुत पहले पहुँच जाने के कारण मेरी रामलीला मंडली वालों से दोस्ती होने लगी. मुझसे खूब बतियाते सब. उनके संवाद तो मुझे याद ही थे. मैं गाकर सुनाता तो सब अचंभित हो जाते. उनका अनुराग मुझ पर इतना बढ़ गया कि रात बारह-एक बजे जब लीला खत्म होती तो वे मुझे अपने ही पास रोक लेते. अपने साथ ही मुझे खाना खिलाते और सुला लेते. मैं रावण के साथ सोता था क्योंकि वह बहुत ज़िन्दादिल और स्नेहिल था. रामचन्द्र जी मुझसे कुछ कम कम बोला करते थे क्योंकि मंडली के सभी लोगों का ध्यान राम से अधिक मेरे ऊपर रहने लगा. रात भर मंडली के साथ बिता के सुबह मैं अपने घर आ जाता. यही सिलसिला हो गया था.

कि एक दिन कुछ अप्रत्याशित हो गया. लक्ष्मण जी अचानक बीमार हो गए. मंडली के अध्यक्ष ने निर्णय लिया कि भरत वाला पात्र लक्ष्मण बन जाएगा. फिर भरत कौन बनेगा ?? तय हुआ कि भरत का रोल बालक विमलेन्दु करेंगे. मेरी सिट्टी-पिट्टी गुम. संवाद तो मुझे याद थे . लेकिन व्यास जी की गाई चौपाइयाँ मुझे समझ नहीं आती थीं. व्यास जी पूरी लीला के सूत्रधार होते थे. उनकी चौपाइयों से ही हर पात्र को यह संकेत मिलता था कि किसको क्या एक्शन करने हैं और क्या संवाद बोलना है. मैने अपनी समस्या उन लोगों को बताई तो रावण जी मेरी मदद को आगे आए. उन्होने कहा परेशान न होना मैं परदे के पीछे से बताता जाऊँगा कि कब क्या करना है. मैं राजी हो गया. आनन-फानन में मुझे तैयार किया गया. जब मंच पर मैने एन्ट्री मारी तो गांव के लोग चौंक गए. खूब तालियाँ बजीं. मंडली वालों की उम्मीद से कुछ बेहतर हो गया था मुझसे. उस दिन से रोज़ ही कोई न कोई भूमिका मुझे मिलने लगी. एक दिन सीता जी को कुछ हो गया तो उन लोगों ने मुझे सीता बनने को कहा. मैं शरमा गया एकदम से. मैने सीता बनने से मना किया तो सब नाराज़ हो गए. उनकी नाराज़गी मुझे बुरी लगी. तो मैने उनके साथ रात में रुकना बन्द कर दिया. उनसे मेल-जोल भी कम कर दिया. मुझे डर लगने लगा कि कहीं किसी दिन ये मुझे सीता बना ही न दें. खैर ऐसा हुआ नहीं.

इस तरह कई सालों तक रामलीला मंडली गांव में आती रही. यह सिलसिला तब बन्द हुआ जब गांव की एक लड़की रामचन्द्र जी पर मुग्ध हो कर उनके साथ भाग गई. गांव मे हंगामा मच गया. रामलीला मंडली को बीच में ही अपना पंडाल उखाड़ के भागना पड़ा. तब से आज तक मेरे गांव में फिर कोई मंडली नहीं आई, न रामलीला हुई.

इस दुखद प्रसंग को छोड़ दिया जाय तो रामलीला उस जमाने में लोगों को कला के संस्कार देती थी. जन-जीवन के नैतिक शिक्षा का माध्यम भी था यह कलारूप. बाद में जब दूरदर्शन आया और दूरदर्शन पर रामायण धारावाहिक आने लगा तो अचानक रामलीला का मंचन बहुत बचकाना लगने लगा. टीवी पर तकनीक से सजी राम की लीला के आगे बिना माइक और बिना पर्याप्त प्रकाश के लीला उबाऊ लगने लगी. बड़ी बड़ी मंडलियाँ बन्द हो गईं या फिर औपचारिकता बस बची. यद्यपि बनारस के रामनगर, इलाहाबाद और मैसूर में आज भी रामलीला का भव्य आयोजन होता है, लेकिन लोगों की वैसी रुचि नहीं रही जैसी पहले थी. आप भी महसूस करते होंगे कि टीवी ने बहुत सी लोक कलाओं और देशज कला माध्यमों को खत्म कऱ दिया है.

रामलीला की शुरुआत कब और कैसे हुई होगी, इसको लेकर अलग-अलग मत हैं. कहा यह जाता है कि राम के वन-गमन के बाद, चौदह बरस की वियोग-अवधि, अयोध्यावासियों नें राम की बाल-लीलाओं का अभिनय कर के काटी थी. कुछ लोग रामलीला का आदि-प्रवर्तक काशी के मेघा भगत को मानते हैं. ये काशी के कतुआपुर मोहल्ले के फुटहे हनुमान के पास रहते थे. इन्हें भगवान राम ने स्वप्न में दर्शन देकर लीला करने का आदेश दिया था. वैसे आधिकारिक रूप से यह माना जाता है कि रामलीला की शुरुआत तुलसीदास की प्रेरणा से काशी के तुलसीघाट पर हुई थी. भारत के अलावा बाली, जावा, श्री लंका में भी रामलीला होती है. बर्मा की रामलीला में तो रावण-वध होता ही नहीं. युद्ध के अंत में रावण राम से क्षमा माग लेता है और युद्ध से विमुख हो जाता है. रामलीला पर छविलाल ढोंढियाल की एक महत्पूर्ण पुस्तक है. भारतेन्दु हरिश्चन्द ने रामलीला से प्रेरित होकर एक चम्पू काव्य रामलीला लिखा था. कुल मिला कर आज रामलीला हमारी स्मृति और शोध का विषय बन कर रह गई है.
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विमलेन्दु
सम्पर्क सूत्र- 8435968893





हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

Tuesday, September 19, 2017

मनोज कुमार पांडेय की नई कहानी "जेबकतरे का बयान"



मनोज कुमार पांडेय

मेरे लिए वे कथाकार बाद में हैं – दोस्त पहले हैं। 2004 में दोस्ती तब शुरू हुई थी जब मेरी कहानी पढ़कर फोन किया। तब से कई मुलाकाते हैं और कई बाते हैं। लेकिन गौरतलब बात यह है कि इस बीच बंदे ने खूब उम्दा कहानियाँ लिखीं और चर्चित भी हुए। मुझसे एक कहानी का भी वादा था, जो आज एक बहुत उम्दा कहानी के साथ पूरा हो रहा है – और वादे और करार हैं वे भी पूरे होंगे। यह दोस्ती तो उम्र भर की है।

जेबकतरे का बयान
मनोज कुमार पांडेय

आप बहुत अच्छे आदमी हैं। अभी आपकी एक आवाज पर मेरा कचूमर निकल गया होता पर आपने बस मेरा हाथ पकड़े रखा। मैं शर्त लगाकर कह सकता हूँ कि आप या तो लेखक हैं या पत्रकार। नहीं भी हैं तो आपके भीतर एक कलाकार का दिल धड़कता है। नहीं तो बताइए कि मैं आपका पर्स मारनेवाला था और आप मुझे यहाँ मेरी पसंदीदा जगह पर बैठाकर बीयर पिला रहे हैं। आपने एक थप्पड़ तक नहीं मारा मुझे। कैसे आदमी हैं आप? आजकल इतना भला आदमी होना भी ठीक नहीं।
वैसे आपने बहुत अच्छा किया जो वहाँ पर शोर नहीं मचाया। मैं भीड़ की तलाश में ही दिल्ली आया था। भीड़ बचाती भी है और भीड़ मार भी देती है। पूरे दो बार भीड़ बस मेरी जान ही ले लेने वाली थी। पहली बार इलाहाबाद में लक्ष्मी टाकीज में पर्स उड़ाते हुए पकड़ा गया। इतनी मार पड़ी कि महीनों उठने का होश नहीं रहा। पर इसी के साथ मेरा डर भी खतम हो गया। हमेशा के लिए। शुरू में बस एक दो मिनट तक दर्द हुआ, हालाँकि यह दर्द इतना भीषण था कि आज भी उसे याद करके काँप जाता हूँ। पर बाद में मैं किसी भी तरह के दर्द के एहसास से मुक्त हो गया। जब मुझे लोग लात घूँसों से मार रहे थे, मेरी हड्डियाँ तोड़ रहे थे तो मैं उन्हें उन्हीं नजरों से देख रहा था जिन नजरों से वहाँ मौजूद तमाशाई इस सब को देख रहे थे। बाद में तो खैर मुझे इसका भी होश नहीं रहा।
वह तो कहिए पुलिस आ गई नहीं तो आपको यह कहानी कोई और ही बैठकर सुना रहा होता। भीड़ का जवाब भीड़ ही होती है। वहाँ इलाहाबाद में इतनी भीड़ नहीं थी। भीड़ की तलाश में मैं मुंबई चला गया। मुंबई लोकल, जिसके बारे में मुंबई का एक अखबार पहले ही पन्ने पर एक कोना छापता है, कातिल लोकल के नाम से। जिसमें छपता है सात मरे, सत्रह घायल। उसी लोकल में मेरा कारोबार चल निकला पर जल्दी ही मेरे मौसेरे भाइयों ने मुझे पकड़ लिया और बहुत मारा। पिटना मेरे लिए कोई नई बात नहीं थी पर यह बात मुझे बहुत बुरी लगी कि वे मारते हुए मराठी में गालियाँ दे रहे थे। मुझे किसी ऐसी भाषा में गाली खाना बहुत बुरा लग रहा था जो मैं नहीं समझता था। मुझे पता होना चाहिए था कि मुझे कौन कौन सी गालियाँ दी जा रही हैं जिससे कि कभी मौका मिलने पर मैं उन्हें सूद समेत वापस कर सकता।
जब आप मेरे धंधे में होते हैं तो आपको हमेशा मौके की तलाश में रहना पड़ता है। और तब पता चलता है कि मौकों की कोई कमी नहीं है। हर कोई आपको मौका देना चाहता है। लोग बहुत दयालु हैं। वे नहीं चाहते कि आप भूखे रहें या कि दिन भर में आपको बीयर की एक बोतल तक नसीब न हो। जैसे अभी एक दिन सुबह से खाली हाथ भटक रहा था कि राजीव चौक में विज्ञापन के लिए लगाई गई एक स्क्रीन पर ब्ल्यू फिल्म चलने लगी। अब बताइए ब्ल्यू फिल्म आजकल कोई ऐसी चीज है जिसे यूँ देखा जाय पर लोग इस तरह से डूब कर देखने लगे कि जैसे जीवन में पहली बार देख रहे हों। कई तो वीडियो बना रहे थे। मैंने डेढ़ मिनट के अंदर दो लोगों की पर्स उड़ा ली।
इस धंधे में धैर्य सबसे जरूरी चीज है। जरा सी भी जल्दबाजी जानलेवा हो सकती है। मुझे भी यह बात धीरे धीरे ही समझ में आई। जब मैं इलाहाबाद से मुंबई के रास्ते दिल्ली आया तो दूसरी जो चीज मुझे साधनी पड़ी वह धैर्य ही थी। पहली चीज थी दिल्ली की मैट्रो। शुरुआत में मैट्रो मुझे किसी दूसरी ही दुनिया की चीज लगती थी। मैट्रो स्टेशन पर ऊँची ऊँची बिजली से चलने वाली सीढ़ियाँ मुझे डरा देतीं। बहुत पहले मैंने किसी अखबार में पढ़ रखा था कि दिल्ली एयरपोर्ट पर एक छोटी सी लड़की इन सीढ़ियों में फँसकर चटनी बन गई थी। मैं इन सीढ़ियों में अक्सर खुद को फँसा हुआ देखता और मेरे शरीर में एक सिहरन सी दौड़ जाती। कँपकँपी होती। ऊपर से मुंबई और दिल्ली की भीड़ में भी बड़ा अंतर था। मुंबई में लोग जब भाग रहे होते तो लगता कि वह किसी का पीछा कर रहे हैं जबकि दिल्ली की भीड़ इस तरह भागती दिखाई देती जैसे उसका कोई पीछा कर रहा हो। खुशी की बात यह है कि मेरे लिए दोनों ही स्थितियाँ शानदार थीं। दोनों ही स्थितियों में मेरे जैसों पर कोई नजर भी नहीं डालता था।
     मैं आपकी बात बात नहीं कर रहा हूँ। पर सच यही है कि मेरे जैसों पर कभी कोई ध्यान नहीं देता। आपको पता है, मैंने पीएचडी कर रखी है! कई प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल होते होते रह गया। फिर करीब पंद्रह लाख रुपये उधार लेकर दरोगा बनने के लिए रिश्वत दी। रिजल्ट आता उसके पहले ही मामला कोर्ट चला गया। बीच में दो सरकारें आईं और गईं। अभी पता चला है कि फिर से परीक्षा ली जाएगी। मेरे पास इतना समय नहीं था। मैं उन लोगों से मुँह छुपाते हुए भाग रहा था जिनसे मैंने उधार लिया हुआ था। भागते भागते पहले मुंबई पहुँचा और फिर एक दिन दिल्ली आ गया। दिल्ली में मेरा एक दोस्त था जो एक राष्ट्रीय अखबार में मुख्य संवाददाता था और ऑफिस में बैठकर प्लास्टिक पीटा करता था। अभी थोड़ी देर में वह भी आ रहा होगा। बीयर पीने और मिलने बैठने के लिए यह जगह हम दोनों की फेवरेट है।
     वह न होता तो मैट्रो मुझे और डराती। जब स्वचालित सीढ़ियों पर पाँव रखने में मैं हकबका रहा होता वह हाथ पकड़कर ऊपर खींच लेता। धीरे धीरे मुझे भी मजा आने लगा। बिना मेहनत किए ऊपर पहुँच जाना भला किसे नहीं अच्छा लगता। फिर तो लाइफ इन ए मैट्रो शुरू हो गई। भीतर तरह तरह के लोग थे। पूरी दुनिया को ठेंगे पर रखते हुए एक दूसरे में डूबे लड़के-लड़कियाँ, मैं उनमें अक्सर अपनी इच्छाओं को जी रहा होता। बुरे से बुरे समय में भी मैंने उन पर हाथ साफ करने की कोशिश कभी नहीं की। बल्कि कई बार तो मैं उन्हें छुप-छुपकर इतने लाड़ से देख रहा होता कि अपने असली काम पर से मेरा ध्यान ही हट जाता। पर धीरे धीरे मैंने खुद पर काबू पा लिया, शो मस्ट गो आन। तब जो दुनिया मेरे सामने खुली वह मुझे कई बार अभी भी अचंभित करती है। 
     मैट्रो में ज्यादातर लोगों को एक दूसरे से कोई मतलब नहीं था। हालाँकि वे एक दूसरे को देखकर मुस्कराते, आँखों में पहचान का एक हल्का सा इशारा उभरता और गुम हो जाता। इसके बाद तो कानों में ठुँसा हुआ स्पीकर था। तरह तरह का गीत-संगीत था, डांस था, शार्ट फिल्में थीं, कामेडी वीडियो थे, बाबाओं के प्रवचन थे, यू ट्यूब पर चलने वाले धारावाहिक थे और भी न जाने क्या क्या था। मैट्रो में घुसते ही लोग मैट्रो को भूल जाते थे और स्मार्टफोन में घुस जाते थे। मुझे बहुत दिनों तक इस बात पर भी अचरज होता रहा कि इसके बावजूद लोग उसी स्टेशन पर उतर पाते हैं जिन पर उन्हें उतरना होता है। जो लोग स्मार्ट फोन से बचे थे वे अमूमन अंग्रेजी की सस्ती किस्म की किताबें पढ़ते दिखाई देते। यह एक साथ अपने अंग्रेजी जानने का प्रदर्शन और सुधारने की कोशिश थी। चेतन भगत ऐसे लोगों का शेक्सपीयर था।
     पर यह तो कमउम्र या कि युवाओं की बात थी। अधेड़ कई बार राजनीतिक चर्चाएँ कर रहे होते। एक राजनीतिक दल के सदस्य यात्रियों के रूप में मैट्रो में चढ़ते और जल्दी ही पूरे कोच को राजनीतिक अखाड़े में बदल देना चाहते। डिब्बे का तापमान बढ़ जाता। मेरे लिए ऐसी स्थिति हमेशा काम की होती जब लोगों के सिर गर्म होते। वे भी शिकारी थे, मैं भी। वे अनजाने ही मेरे संभावित शिकारों का ध्यान राजनीतिक और धार्मिक स्थितियों पर ले जाते और लोग जूझने लगते। जब मैं अपना शिकार चुन रहा होता तो तो पाता कि कई और दूसरे भी शिकार में लगे होते। कई अधेड़ इस तरह से मोबाइल में आँखें गड़ाए होते जैसे वह किसी बहुत गंभीर चीज में मुब्तिला हैं और उनकी स्क्रीन पर सामनेवाली लड़की की छातियाँ या टाँगें दिख रही होतीं। कई हाथों में माला फेर रहे होते और उनकी लोलुप निगाहें उन किशोर-किशोरियों पर फिसल रही होतीं जो पूरी दुनिया को भूलकर एक दूसरे में डूबे होते। इस सब के बीच कभी कभी दिखने वाले वे लोग बहुत ही पवित्र लगते जो प्रेमचंद, शरत या दोस्तोएव्स्की पढ़ रहे होते। मैं मौका पाकर भी उन्हें छोड़ देता।
     दिल्ली मैट्रो का पूरा भूगोल समझ लेने के बाद मैंने राजीव चौक, कश्मीरी गेट, मंडी हाउस या इंद्रलोक जैसे एक्सचेंज स्टेशनों पर अपना ध्यान केंद्रित किया। इसके बाद इफ्को चौक, नोएडा सिटी सेंटर जैसी जगहें थीं। वे सारी जगहें मेरे काम की थीं जहाँ भीड़ थी और लोगों का ध्यान अपने से ज्यादा गाड़ी पकड़ने पर था। इसके बाद इसमें कोई अचरज की बात नहीं थी कि उनमें से किसी का पर्स मेरी जेब में पहुँच जाता। लोगों को तुरंत पता ही न चलता। कई बार पता चल भी जाता तो लोग इस तरह से ठसाठस भरे होते कि उसकी समझ में न आता कि वह किस पर शक करे। सबसे बुरी बात यह होती कि वे शक भी करते तो उन पर जो गरीब दिखते। मैं तो आप देख ही रहे हैं कि किस तरह से टिपटाप रहता हूँ। लोग धोखा खा जाते हैं। असल बात यह है कि वे धोखा खाते रहना चाहते हैं। वे खुद को बदलना नहीं चाहते।
     इसके बावजूद कभी लगे कि शक मुझ पर भी जा सकता है तो सामने वाला अपना शक जाहिर करे उसके पहले ही मैं भी खुद को शिकार घोषित कर देता हूँ। सामने वाले ने जैसे ही कहा कि अरे मेरा पर्स कि पाँच सेकेंड बाद मैं भी चिल्ला पड़ता हूँ अरे मेरी घड़ी...। जबकि मैं घड़ी कभी पहनता ही नहीं। टाइम देखने का काम मोबाइल से चल जाता है। वैसे भी मेरे धंधे में टाइम का कोई वांदा नहीं। असली बात है धैर्य। बार बार टाइम देखने वाला तो शर्तिया पकड़ा ही जाएगा। पर कई बार मेरे जैसे लोग भी पकड़ ही लिए जाते हैं। आखिर आज आपने पकड़ ही लिया। यह अलग बात है कि आप बहुत ही शरीफ व्यक्ति हैं और मुझे बैठाकर बीयर पिला रहे हैं।
     जानते हैं जैसे लोग तरह तरह के होते हैं वैसे ही उनकी पर्स भी। कामयाबी से हाथ साफ करने के बाद अगला काम पर्स को ठिकाने लगाना होता है। रुपये के अलावा उनमें तरह तरह के कार्ड्स, परिचय पत्र, तसवीरें, पते, फोन नंबर, कंडोम, आई पिल्स या अनवांटेड-72 जैसी गोलियाँ, शाम को घर ले जानेवाले सामानों की लिस्ट और कई बार चिट्ठियाँ भी। तमाम लोग अपनी अपनी आस्था के हिसाब से देवी-देवताओं की तसवीरें, तांत्रिक त्रिभुज या शुभ चिह्न रखते। तरह तरह के फूल, अभिमंत्रित धागे, कचनार या कि समी की पत्तियाँ। यह अलग बात है कि इसके बावजूद उनका पर्स मेरे हाथ में होता और मैं इन सबको निकाल बाहर करता। पर एक ऐसी चीज है जिसे मैं कभी नहीं फेंक पाता। तसवीरें फेंकते हुए मेरे हाथ काँपने लगते हैं।
     आपको भरोसा नहीं होगा पर मेरे कमरे पर कई फाइलें उड़ाई गई पर्सों से प्राप्त तसवीरों से भरी पड़ी हैं। मुझे अपने कारनामों का हिसाब रखने का कोई शौक नहीं पर तसवीरें पता नहीं क्यों मैं नहीं फेंक पाता। नहीं मैं ईश्वर या देवी-देवताओं वाली तसवीरों की बात नहीं कर रहा हूँ। मैं तो उन तसवीरों की बात कर रहा हूँ जो मेरे द्वारा शिकार किए गए व्यक्तियों के प्रिय व्यक्तियों की होती है। बच्चे, पत्नी, प्रेमिका, किसी दोस्त या फिर माँ या बाप की तसवीर। मैं उन तसवीरों पर वह तारीख और जगह लिखता हूँ जहाँ से वे मेरे पास आईं। खाली समय में मैं अक्सर उन तसवीरों को निहारते हुए पूरा पूरा दिन बिता देता हूँ। काश कि वह तसवीरें मैं कभी उन्हें वापस कर पाता जिन्होंने उन्हें सँजोकर रखा हुआ था। मैं भी उन्हें उतने ही प्यार से अपने पास रखना चाहता हूँ।
कई बार मैं उन तसवीरों में गुम होकर उदास हो जाता हूँ। कौन हैं वे लोग? उनका उस व्यक्ति से क्या रिश्ता रहा होगा जिनका मैंने शिकार किया। तब मेरे भीतर एक बहुत ही बेसब्र इच्छा जोर मारती है कि मैं कभी उन लोगों से मिल पाऊँ। उनसे अपने किए की माफी माँगूँ कि मैंने उन्हें उस व्यक्ति से दूर कर दिया जो उन्हें इस तरह से अपने कलेजे से लगाकर रखता था। यह सब सोचते हुए कई बार मेरी आँखों में आँसू आ जाते हैं। कमाल की बात यह है कि शुरुआती दिनों के अलावा मैंने अपने शिकारों के बारे में कभी नहीं सोचा। यह साधने में थोड़ा वक्त जरूर लगा मुझे पर यह मैंने कर लिया। आप पढ़े-लिखे व्यक्ति लग रहे हैं। आपको देखकर ही पता चल जाता है कि आपके भीतर एक कलाकार छुपा हुआ है। आप बताएँगे कि वह तसवीरें आज तक मैं फेंक क्यों नहीं पाया?
अरे नहीं, उन लोगों का उधार मैंने अभी तक नहीं चुकाया है। आप सोचेंगे कि अब तो मेरे पास बहुत सारे पैसे होंगे, चुका क्यों नहीं देता पर यह सच नहीं है। मेरे पास कई बार अगले दिन की चाय का भी पैसा नहीं होता। जो कमाता हूँ सब खर्च हो जाता है। आजकल वैसे भी लोग पर्स में भला कितने पैसे रखते हैं? और कभी हो भी गए तो भला क्यों चुकाने जाऊँगा। आप उन लोगों को नहीं जानते। वे मेरे ऊपर इतना ब्याज लाद देंगे कि उसे चुकाने के लिए मुझे डकैती ही डालनी पड़ेगी। यहाँ सब कुछ शांति से चल रहा है। मैं चाहता हूँ कि सब कुछ इसी तरह से चलता रहे। आज तो आप भी मिल गए और इतने इत्मीनान से बैठकर मेरे साथ बात भी कर रहे हैं। मैं बता नहीं सकता कि मैं अपने धंधे से कितना खुश हूँ। यह न होता तो भला आप आज कैसे मिलते।
देखिए मैंने आपको अपनी पूरी आपबीती सुनाई। आप पुलिस नहीं है अच्छे आदमी हैं। कलाकार हैं। पुलिस होती तो मैं दूसरी कहानी सुनाता। एक बार तो मैंने पुलिस को भी ऐसी कहानी सुनाई थी कि दो पुलिसवाले थे और दोनों ही इमोशनल हो गए। कहानियाँ अभी भी असर करती है बस उन्हें नई और अनोखी और अविश्वसनीय होना चाहिए। लोग अविश्वसनीय कहानियों पर ही सबसे ज्यादा भरोसा करते हैं। खैर छोड़िए आज का पूरा समय तो आप को अपनी रामकहानी सुनाने में बीत गया। यह पहली बार है कि मैंने किसी पर्स को हाथ लगाया और वह अब भी वहीं मौजूद है जहाँ उसे नहीं होना चाहिए था। कम से कम एक बोतल बीयर तो और पिलाते जाइए। शरीफ कहे जाने वाले लोग तो हर मोड़ पर चार टकराएँगे। आपने कभी किसी जेबकतरे के साथ बैठकर बीयर पिया है? आप पैसे खर्च करें तो मैं थोड़ी और देर तक आपको यह मौका देने के लिए तैयार हूँ।
    
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मनोज कुमार पांडेय - 8275409685




हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad