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Friday, April 20, 2018

नई सदी की युवा कविता - कुछ प्रश्नों के उत्तर



किसी समाज में कविता का बचा होना मनुष्यता के बचे होने का प्रमाण है
विमलेश त्रिपाठी


नई सदी की युवा कविता पर कुछ भी कहने से पहले मैं यह स्वीकार करना जरूरी समझता हूँ कि जब मैंने लिखना शुरू किया तब यह सदी लगभग अपने अंतिम चरण में थी – बतौर तथ्य अगर कहूँ तो कह सकता हूँ कि मेरी तीन कविताएँ 2003 में ही वागर्थ के किसी अंक में पहली बार प्रकाशित हुई थीं। उस समय से लेकर आज तक की कविता पर लागातार मेरी दृष्टि बनी रही है। बेशक इस दौरान खूब-खूब कविताएँ लिखी गईं, खूब-खूब पुरस्कार लिए-दिए गए लेकिन बहुत कम ऐसी कविताएँ सामने आईं जिनमें कालजयी होने की क्षमता हो। कुछ प्रतिष्ठित पुरस्कार प्राप्त कविताएँ भी उस स्तर की नहीं रहीं जिन्हें वाकई पुरस्कार मिलना चाहिए था – इस दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि वरिष्ठ कवियों या आलोचकों द्वारा उन्हीं कविताओं को चिन्हित किया गया जिनके कवि के साथ उनके किसी न किसी रूप में संबंध या ताल्लुकात थे – चुपचाप बहुत अच्छी कविताएँ लिखने वाले और किसी गुट या मठ में विश्वास न करने वाले कवियों पर कुछ भी कहने से लोग बचते रहे। एक और बात गौर करने लायक है कि अकादमिक तबकों में युवा कविता को वह तरजीह न मिली जिसकी वह हकदार थी – अलबत्ता छात्रों ने जरूर कुछ कवियों को बतौर पाठक चिन्हित और प्रशंसित किया।

ये कुछ और चुपचाप लिखने वाले कवि अपने साथ किसी गॉडफादर को लेकर नहीं आए इसलिए अपने कहन और मिजाज में पूर्ववर्ती कविता से भिन्न स्वर लेकर आए- इनके कहन में न तो अतिशय कलात्मकता और चमत्कार का भार था और न ही कविता को लद्दड़ गद्य बना देने की प्रवृति। इनके पास अपने और संसार के दुख थे, अपने संघर्ष थे, अपने लिए एक सही रास्ते के चुनाव की छटपटाहट थी और सच को सच कहने का माद्दा था। इनके एक हाथ में घर की जिम्मेदारी थी तो दूसरे हाथ में बद से बदतर होते जा रहे देश को सुंदर बनाने का स्वप्न था। ये लागातार लड़ रहे थे, पराजित भी हो रहे थे लेकिन खूबी यह कि गिर कर अपने शरीर से खुद ही धूल झाड़कर फिर से चल पड़ने वाले इन कवियों ने कविता में कुछ नया और भिन्न किया। वे सबकुछ जानते समझते हुए अपने हिस्से की कठिन यात्राएँ कर रहे थे -
हम शहद बाँटते हैं
मधुमक्खियों की तरह
हज़ारों मील लम्बी और कठिन है
हमारे जीवन की भी यात्राएँ

उन्हीं की तरह
रहते हैं हम अपने काम में मगन
उन्हीं की तरह धरती के
एक-एक पुल की गंध और रस का
है पता हमें
वाकिफ़ हैं हम
धरती की नस-नस से
              (सुरेश सेन निशांत)

दूसरी बात यह कि इस सदी को बाजार ने गहरे प्रभावित किया इस बाजार की खासियत यह रही कि यह अब आपके घर में यहाँ तक कि शयन कक्ष में भी प्रवेश कर गया – इस बाजार समय में हर चीज बेची और खरीदी जाने लगी। इस बाजार ने जो सबसे नाकारात्मक काम किया वह कि उसने मूल्यों की जगह पैसे को स्थापित किया। अब पैसा ही सबसे बड़ा मूल्य था। यह तथ्य है कि साहित्य अनगिनत समय से मूल्यों को बचाने के लिए लड़ रहा है – इस सदी में भी मूल्यों के बचाने की लड़ाई उन कवियों ने ही पुरजोर तरीके से लड़ी जो अपनी जमीन और अपनी माटी से जुड़े हुए थे। इस बाजार ने कुमार विश्वास जैसे बिकाऊ और तथाकथित सेलिब्रिटी कवियों को पैदा किया तो उस बाजार के दबाव ने ही केशव तिवारी, कुमार अनुपम, मनोज कुमार झा और अदनान काफिल दरवेश जैसे कई प्रतिबद्ध कवियों को भी जन्म दिया। यहाँ कवियों की भी दो जमात देखी जा सकती है – एक जिन्हें बाजार ने अपने जैसा बना दिया और दूसरे जो इस बाजार और बाजारवाद के खिलाफ आद्यन्त लड़ने के संकल्प के साथ आगे बढ़ रहे हैं।

सोशल मिडिया का आना इस सदी की एक खास परिघटना है। कविता के संदर्भ में यह और अधिक महत्वपूर्ण इसलिए है कि यह अभिव्यक्ति के एक सहज उपलब्ध माध्यम के रूप में विकसित हुआ। हमारी पीढ़ी ने जब लिखना शुरू किया था तो इस तरह के सहज उपलब्ध मंच नहीं थे इसलिए हमें कविताएँ छपने का महीनों इंतजार करना पड़ता था – साथ ही कविताओं को टाइप कराकर डाक से भेजना भी एक श्रमसाध्य और खर्चीला काम था – शायद यही वजह था कि कविताएँ लिखने के बावजूद मैंने किसी पत्रिका को कविता न भेजी। यह तभी संभव हो पाया जब मैं बेरोजगार न रहा। बाद में सोशल मिडिया से जुड़ाव हुआ – अपने संकोची स्वभाव के कारण जिन कवियों से मैंने बातें तक न की थीं उनसे बात भी हुई। मुझे याद आता है कि राजेश जोशी, उदय प्रकाश, कुमार अंबुज आदि वरिष्ठ कवियों से पहली बार मेरी बात सोशल मिडिया पर ही हुई। यह सोशल मिडिया का एक साकारात्मक पहलू जरूर है लेकिन इस मिडिया ने कवियों की बाढ़-सी ला दी, इस बाढ़ में कचरे के ढेर अधिक इकट्ठे हुए। तुरत प्रतिक्रिया को भी कविता कहा और माना जाने लगा – सोशल मिडिया ने कवियों को जरूरी धैर्य और आवश्यक मिहनत से दूर किया। लोगों ने अपने-अपने ब्लॉग बना लिए और कुछ भी लिखकर स्वयं को कवि मानने लगे। कई लोगों ने तो अपने नाम के आगे कवि को श्री और श्रीमती की तरह जोड़ लिया। कुल मिलाकार यह कि कविता लेखन के लिए जिस गंभीरता, दायित्वबोध और धैर्य की जरूरत होती है – सोशल मिडिया ने उसको नष्ट किया। लेकिन मेरे जैसे संकोची और चुपचाप रहने वाले लोगों के लिए इस मिडिया ने यह किया कि हमें एक बड़े पाठक वर्ग से जोड़ा। हमारे अंदर के डर और उपेक्षाबोध को तिरोहित कर इसने हमारे अंदर आत्मविशावास भरा। इसे इस तरह से भी देखे जाने की जरूरत है।

सोशल मिडिया की बदौलत ही कई लोगों ने कविता पर हाथ आजमाना शुरू किया – कुछ लोग जिनकी कविताएँ अपनी डायरी तक ही सीमित थीं वह अब फेसबुक और ब्लॉग पर चमकने लगीं। इसके कारण कविता और कवियों की एक बहुत ही नई और अभूतपूर्व पीढ़ी सामने आई – जाहिर है कि इनमें कई लोग ऐसे हैं जिन्हें रेखांकित भी किया गया। वीरू सोनकर, रश्मि भारद्वाज, कल्पना झा और शायक आलोक जैसे कवि पहले फेसबुक पर छपे बाद में इन्हें पत्रिकाओं में जगह मिली- यह चमत्कार से कम नहीं था।

इन कवियों की भीड़ में कुछ ऐसे कवि भी सामने आए जिनके पास अपनी माटी की गंध थी – जिनके पास अपने लोक-अनुभव का एक समृद्ध संसार था। इन कवियों ने अपने लोक अपनी माटी और अपने लोक को कविताओं में जगह दी। मिथिलेश कुमार राय गाँव में रहते हुए जमीन से जुड़ी कविताएँ लिख रहे हैं – नील कमल ने भी लोक जीवन को आधार बनाकर कुछ अच्छी कविताएँ लिखी हैं – ये ऐसे कवि हैं जिके पास अपनी जमीन है ये शब्दों के मार्फत कोई पहेली रचने वाले कवि नहीं हैं और न ही बुझव्वल बुझाने वाले अतिशय कलावादी कवि। ये ऐसे कवि हैं जिनकी कविताएं जमीन से पैदा होकर आसमान को संबोधित हैं। ये अंग्रेजी साहित्य घोंटकर विश्व कविता की उल्टी करने वाले कवि तो कतई नहीं हैं।

यहाँ यह फिर दुहराने की जरूरत है कि जिन युवा कवियों के पास अपनी जमीन है उनके पास एक खास तरह की विचारधारा भी काम कर रही है – अनुज लुगुन की कविताओं की पहचान इसलिए है कि वे आदिवासी समाज के प्रतिनिधि युवा कवि के रूप में सामने आते हैं, उसी तरह केशव तिवारी, महेश चंद्र पुनैठा, बहादुर पटेल, सिद्धेश्वर सिंह जैसे कवि अपनी लोक संपृक्ति के कारण लोकप्रिय और विश्वसनीय कवि बन सके हैं। यहाँ इस बात का उल्लेख भी जरूरी है कि कवियों की एक पीढ़ी ऐसी भी है जो कला का इस्तेमाल कर कालजयी कविताएँ लिखने के लिए मरी जा रही है – यह ऐसे कवियों की जमात है जिसके लिए घनानंद कह गए हैं – लोग हैं लागि कवित्त बनावत। तो यह पीढ़ी शब्दों के पैंतरे और कहन की अद्वितीयता सिद्ध करने में ही अपनी पूरी ऊर्जा लगाए दे रही है लेकिन इन्हें कौन समझाए कि ट्रू पोएट्री के लिए खुद भी ट्रू होना पड़ता है। अपने व्यक्तिगत जीवन में इमानदार हुए बिना, संसार को सुंदर बनाने की विचारधारा को खून में शामिल किए बिना बड़ी कविता लिखी ही नहीं जा सकती।

यह ठीक है कि कला का प्रथम लक्ष्य आनंद प्रदान करना है – लेकिन आनंद और मनोरंजन ही कला का अंतिम उद्देश्य मान लेना कला को सीमित और संकुचित बना देना है। ठीक उसी तरह कला को सिर्फ विचारधारा का वाहक बना देना भी खतरनाक है। कविता अन्य कलाओं से इस मायने में भिन्न है कि वह बहुत जल्दी हृदय में प्रवेश करती है और उसका असर भी तीव्र होता है – क्या यही कारण नहीं है कि पुराने जमाने में जब योद्धा थककर निराश हो जाते थे तो कविता उनमें नए जोश और उमंग का संचार करती थी – यह एक अटपटा उदाहरण भले हो लेकिन इससे यह तो सिद्ध होता ही है कि संगीत और नृत्य या पेंटिंग और फिल्म से अधिक ताकत कविता में है। यहाँ यह भी कहना जरूरी लगता है कि कविता जब इतनी ताकतवर विधा है तो उसे सकारात्मक प्रतिरोध और रचनात्मक आन्दोलन का हथियार जरूर बनाया जा सकता है। लेकिन कविता यह काम तभी करेगी या कर सकती है जब वह ईमानदार हृदय से निकले और आम लोगों तक इसकी पहुँच बने।
लेकिन यह कविता का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि नई सदी की चकाचौंध रोशनियों और तेजी से बदलते हुए समय के बीच जोर-जोर भागते आम मनुष्य के बीच कविता के लिए बहुत ही कम जगह बची है। यह जरूर है कि सोशल मिडिया के आगमन के बाद एक नए तरह का पाठक वर्ग पैदा हुआ है लेकिन वह भी कितना गंभीर है यह विमर्श का मुद्दा है। रही बात आलोचकों के बीच नई सदी की कविता के मूल्यांकन की तो यह काम एक तरह से अनछुआ ही है। अकादमिक तबके के लोग निराला और केदार से होते हुए कुछ एक स्वनामधन्य कवियों तक ही पहुँच पाए हैं। कवियों की एक बड़ी जमात है जो चुपचाप अपना काम कर रही है लेकिन वह लगभग अनालोचित ही है। यह व्यर्थता की बात नहीं है। अनोलोचित होकर न कवि व्यर्थ हो सकता है और न कविता। उसी तरह किसी कवि या कवियों की जमात का मुल्यांकन न कर भी आलोचना व्यर्थ नहीं। आलोचना के पास और भी जरूरी काम हो ही सकते हैं लेकिन अब डेढ़ दशक के बितने के बाद नई सदी की कविता का समग्र मूल्यांकन होना चाहिए और यह इस तरह होना चाहिए कि दूध का दूध और पानी का पानी हो जाय। निश्चय ही यह कार्य एक जरूरी इमानदारी की माँग भी रखता है।

आलोचक और आलोचना के बिना भी कविता की जो जगह समाज में है वह बनी ही रहेगी। जिस तरह हम रोना और हँसना नहीं छोड़ सकते उसी तरह कविता के बिना हमारा जीवन नहीं चल सकता है – कविता समाज में कई-कई शक्लों में मौजूद है – कहीं प्रत्यक्ष तो कही परोक्ष रूप में। किसी समाज में कविता का बचा होना मनुष्यता के बचे रहने का प्रमाण है यह बात हमें याद रखनी चाहिए।
साभार - वागर्थ
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हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

Monday, April 16, 2018

कथा संवाद



किस्सा-ए-मिड डे मील बजरिए अजबलाल एम. डी. एम.
                            मृत्युंजय पाण्डेय


हम प्रयोगकाल के दौर से गुजर रहे हैं । वर्तमान समय में सरकारें नित नए प्रयोग कर रही हैं । कभी आदिवासियों को लेकर प्रयोग हो रहे हैं, तो कभी, किसानों को लेकर, तो कभी बच्चों को लेकर । मिड डे मील यानी मध्यान्ह भोजन इसी प्रयोग का एक हिस्सा है । भारत सरकार की ओर से मध्यान्ह भोजन 15 अगस्त, 1995 को प्रारम्भ की गई थी । इस योजना के अंतर्गत प्राथमिक विद्यालयों के विद्यार्थियों को प्रतिदिन 100 ग्राम भोजन दिया जाता है । सरकार का उद्देश्य बच्चों के स्वास्थ में सुधार लाना है और साथ ही उन्हें स्कूल की तरफ आकर्षित करना भी है । पंकज मित्र की अजबलाल एम. डी. एम. कहानी इसी विषय को केंद्र में रखकर लिखी गई है । यह कहानी मिड डे मील की सच्चाई से पर्दा उठाती है । इस कहानी का शीर्षक थोड़ा अजब है । वैसे पंकज मित्र की लगभग हर कहानी और हर पात्र का नाम थोड़ा अजब ही रहता है । अजबलाल के साथ एम. डी. एम. जुड़ा है । पहली नजर में कहानी पढ़ने से पूर्व यह लगता है कि यह कोई बड़ा पोस्ट वगैरह है । पर कहानी पढ़ने के बाद पता चलता है कि एम. डी. एम. का फूल फार्म मिड डे मील और महा धूर्त मास्टर है । कस्बे का हर कोई अपने-अपने अनुसार इसका अर्थ लगाता है । आप भी कुछ अन्य अर्थ लगा सकते हैं ।
     अजबलाल एम. डी. एम. एक बैठक में लिखी गई कहानी लगती है । दस पृष्ठों की कहानी में कहीं भी पैराग्राफ नहीं बदला गया है । एक ही बैठक में लिखी गई यह कहानी एक ही साँस में पढ़ने की माँग करती है । टुकड़ों में इसे नहीं पढ़ा जा सकता । सच्चाई तो यही है कि पंकज मित्र की कोई भी कहानी टुकड़ों में नहीं पढ़ी जा सकती । टुकड़ों में पढ़ने से स्वाद में बाधा उपस्थित होती है । रसास्वादन में खलन पड़ता है ।
पंकज मित्र
     इस कहानी का हीरो अजबलाल स्कूल के दिनों से ही जिद्दी और धुन का पक्का है । एक बार वह जिस काम को करने की ठान लेता है तो फिर उसे करके ही छोड़ता है । धुन का पक्का अजबलाल ईमानदार भी है और हर ईमानदार आदमी की तरह उसे भी अपनी ईमानदारी की कीमत चुकानी पड़ती है । अजबलाल अजब-गज़ब कारनामें और शरारते करते हुए एक दिन कस्बे के स्कूल से इंटर पास कर लेता है । उसके इंटर पास करते ही, हर मध्यवर्गीय पिता की तरह, उसके पिता के मन की सोई हुई इच्छाएं जाग जाती हैं । वह उसे इंजीनियर बनते हुए देखना चाहते हैं । अजबलाल की इच्छा नहीं जानी गई, जैसा की हर मध्यवर्गीय परिवारों में होता है और उसके पिता शोभनलाल अपने घर को बैंक में गिरवी रखकर अजबलाल का एडमिशन सुदूर दक्षिण के एक इंजीनियरिंग कॉलेज में दक्षिणा ले-देकर करवा देते हैं । उसके बाद जैसा की गांवों में होता है, वही सब हुआ । अजबलाल की गज़ब-गज़ब कहानियाँ तैयार होने लगी । हर पिता की तरह शोभनलाल भी बड़े-बड़े सपने सँजोने लगे । शोभनलाल के घर में ताश की चौकड़ी जमने लगी । जहाँ ताश खेलने के साथ-साथ चाय पी जाती और अजबलाल की संभावित नौकरी और शादी की बात की जाती । यह सब स्वाभाविक ही था । एक मध्यवर्गीय या निम्न-मध्यवर्गीय परिवारों में ऐसा होता है । कथाकार अमकांत की डिप्टी कलक्टरी को थोड़ा यहाँ याद कीजिए । यदि सपने देखना इस वर्ग का हक है तो सपने टूटना भी इस वर्ग का यथार्थ है । अमरकान्त की डिप्टी कलक्टरी में भी शकलदीप बाबू का सपना टूटता है और इस कहानी के शोभनलाल का भी सपना टूटता है । अजबलाल इंजीनियर नहीं बनता । डेढ़ साल के अंदर ही अजबलाल ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई छोड़ दी । बाप के सपनों को छोड़ वह अपने सपनों के पीछे भागने लगा ।  उसने दिल्ली में एक बिल्डर के यहाँ काम करते हुए, दूरस्थ शिक्षा का लाभ उठाते हुए बी. एड. की पढ़ाई पूरी की । अजबलाल स्कूल मास्टर होना चाहता था । पर उसके पिता उसे इंजीनियर के रूप में देखना चाहते थे । अजबलाल के पिता शोभनलाल अपनी मित्र मंडली को अपने पुत्र की झूठी कहानियाँ सुनाया करते थे । शोभनलाल मित्र मंडली में धाक जमाने के लिए घर से पैसा भेजा करते थे और वही पैसा अजबलाल उन्हें भेजता था । ऐसा होता है । गाँवों में बच्चों की शादी-ब्याह के लिए लोग ऐसा भी करते हैं और अजबलाल के पिता भी वही कर रहे थे । पर यह झूठ बहुत दिनों तक नहीं चला । कुछ ही दिनों बाद बैंक वाले घर पर कुर्की जब्ती का नोटिस लेकर आ गए । शोभनलाल इस सदमे को सह न सके और चल बसे ।
     शोभनलाल की मौत के बाद कुछ लोग अजबलाल को यह सलाह देते हैं कि शोभनलाल की मौत को किसान आत्महत्या साबित कर दिया जाए । इससे कुछ मुआवजा भी मिल जाएगा और बैंक का कर्जा भी कुछ चूक जाएगा । पर, अजबलाल इस प्रस्ताव को नहीं मानता । अपने बाप के कर्ज को चुकाना वह अपना फर्ज मानता है । वह छोटे-मोटे काम करके कर्ज चुकाने में लग भी जाता है और जिद्दी की तरह मास्टरी प्राप्त करने में लगा रहा और एक दिन वह निहायत प्रयोगवादी विभाग में यानी प्राथमिक विद्यालय में लग जाता है ।
     सरकार की इस प्रयोगवादी योजना ने (मिड दे मील) भारत की प्राचीन परम्परा यानी गुरु-शिष्य की महान परम्परा को नष्ट कर दिया है । गुरु-शिष्य, गुरु-शिष्य न रहकर खिचड़ी प्रदाता और उपभोक्ता की श्रेणी में आ गए हैं । अब एक से लेकट आठवीं क्लास तक पढ़ाई को छोड़ सब कुछ होता है । शिक्षक का काम अब पढ़ाना-लिखाना नहीं, बल्कि खिचड़ी बनवाना और बच्चों को खिलाना हो गया है । अब पढ़ाई से ज्यादा कड़ाही का महत्त्व बढ़ गया है और सबसे सफल शिक्षक वही था (है) जो खिचड़ी बनवाकर बिना छिपकली, तिलचट्टा आदि गिरवाए बच्चोंको खिचड़ी खिलवा दे । बात यहाँ तक भी रहती तो ठीक थी । लेकिन बात यही तक खत्म नहीं होती । यह खिचड़ी और भी बहुत सारी खिचड़ी खिला रही है । या यह भी कह लीजिए कि इस खिचड़ी की आड़ में और भी अन्य प्रकार की खिचड़ियाँ पक रही हैं । भरष्टाचारी यहाँ भी अपनी जगह ढूँढ लिए हैं ।
     अजबलाल एक ईमानदार शिक्षक बनना चाहता था, पर यह व्यवस्था उसे ईमानदार बनने नहीं दे रही थी । उसकी सबसे बसी समस्या यह थी कि बाप का कर्ज चुकाना है, इसलिए वह कुछ खुलकर बोल भी नहीं पाता था । पर, वह भीतर-ही-भीतर अपना काम कर रहा था । उसे अपने बड़े अधिकारी यानी शिक्षा विभाग पदाधिकारी (डी. ई. ओ.) साहब के घर रोज दो किलो शुद्ध दूध भिजवाना पड़ता था । एम. डी. एम.  नाम से एक डेयरी फार्म भी खुला था । यानी, जो फार्म गरीब बच्चों के लिए खुला था, उन्हें कुपोषण के शिकार से बचाने के लिए, उसका भोग साहब लोग लगा रहे थे । शुद्ध दूध की पूर्ति के लिए साहब लोग अतिरिक्त चावल-दाल देते थे । और जो शिक्षक शिक्षा विभाग के पदाधिकारी के घर पैकेट का दूध भिजवाता था उसकी पोस्टिंग लावालाँग प्रखण्ड में कर दी जाती थी । 
     एक दिन अजबलाल को भी लावालाँग प्रखण्ड जाना पड़ा । बैंक का कर्ज चुकता होते ही अजबलाल साहब के घर दूध पहुंचाना बंद कर दिया । उसने सिर्फ बंद ही नहीं किया बल्कि यह हिदायत भी दे आया कि ‘प्रेसवालों के सामने एम. डी. एम. की पूरी पोल खोल देगा । यानी “सरकार की प्रिय योजना, जिस पर नाज था जिले को, राज्य को और देश को भी” उसकी पोल खोल देगा । यह सिर्फ योजना की नहीं बल्कि सरकार की पोल खोलनी हुई और कोई भी सरकार यह नहीं चाहेगी कि उसकी कोई भी योजना असफल हो या उस पर कोई सवाल खड़ा करे । आखिर इस योजना से बहुतों को लाभ जो होता था । लावालाँग जाने के बाद भी वह अपने जिद से बाज नहीं आया । वह प्रेसवालों को रजिस्टरों की फोटोकॉपी उपलब्ध करता रहा और प्रेसवाले साहब को दुहते रहे । वर्तमान समय में प्रेसवाले भी इस भष्टाचार के दलदल में फँसते जा रहे हैं ।
     अजबलाल को फँसाने के लिए उस पर कई आरोप लगाते हैं । जैसे – “अपने स्थान पर एक लड़के को पढ़ाने के लिए रखना जिसका संबंध जंगल के खतरनाक तत्त्वों से साबित किया जाने लगा और उसके जरिए उनको धन मुहैया कराना वगैरह-वगैरह ।” अंत में अजबलाल को नौकरी से निकाल दिया जाता है । इस व्यवस्था में एक ईमानदारी आदमी की परिणति यही है ।
     जिस प्रकार मशीन की जान पुर्जे होते हैं । उसी प्रकार किसी योजना की जान उसमें काम करने वाले लोग ही होते हैं । जिस प्रकार पुर्जे का विद्रोह मशीन को खराब कर सकता है उसी प्रकार इनका विद्रोह भी सारे प्रयास पर पानी फेर सकता है । कहानी खत्म होने तक पदाधिकारी यह साबित करने की कोशिश में लगे हुए हैं कि जंगल के खतरनाक तत्त्वों के साथ अजबलाल के संबंध हैं । यकीन मनीय, एक दिन अजबलाल का संबंध जंगल के खतरनाक तत्वों से जोड़ कर उसे गोली मार दी जाएगी ।
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मृत्युंजय पाण्डेय, असिस्टेंट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, सुरेन्द्रनाथ कॉलेज, (कलकत्ता विश्वविद्यालय)
संपर्क : 25/1/1, फकीर बगान लेन, पिलखाना, हावड़ा – 711101
मोबाइल : 9681510596 ईमेल आईडी : pmrityunjayasha@gmail.com



हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

Tuesday, November 28, 2017

क्यों देखनी चाहिए पंचलैट - स्मिता गोयल एवं यतीश कुमार



पंचलैट -  साहित्य को सिनेमा को करीब
लाने का एक साहसिक प्रयास
स्मिता गोयल
यतीश कुमार

आंचलिक भाषा और हिंदी साहित्य के अमर कथा शिल्पी फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी पंचलाइट पर बनी फिल्म 'पंचलैट' १७ नवम्बर २०१७ को भारतीय सिनमा के पटल पर अपनी एक नई छाप छोड़ने आ गयी। पंचलैट शब्द अपभ्रंश है पंचलाइट का, जिसे पेट्रोमेक्स कहते हैं।

निर्देशक प्रेम प्रकाश मोदी  ने एक असाधारण प्रयास किया है साहित्य और सिनेमा जगत को जोड़ने का। इस फिल्म में संगीत-कल्याण सेन का है। इसके गीत मधुर और कर्णप्रिय हैं जो पुराने दिनों के गानों की झलक देते हैं। रंगमंच के दिग्गज कलाकारों ने मिलकर इस फ़िल्म में चार चाँद लगा दिया हैं। अमितोष नागपाल व अनुराधा मुखर्जी मुख्य भूमिका में हैं। इनके अलावा यशपाल शर्मा, राजेश शर्मा, रवि झंकाल, ब्रिजेन्द्र काला, कल्पना झा, वीरेन्द्र सक्सेना, प्रणय नारायण, इकबाल सुलतान, सुब्रत दत्त, ललित परीमू,  अरूप जागीरदार, मालिनी सेनगुप्ता, पुण्यदर्शन गुप्ता,अरुणिमा घोष की भी अहम भूमिकाएं हैं और हर एक ने अपने किरदार के साथ पूरा न्याय किया है। किरदार भी ऐसे जो आपको परदे पर यथार्थ का दर्शन करा रहे हों। नायक राजकपूर की आवारा फ़िल्म से बहुत प्रभावित है और राजकपूर की नक़ल की कोशिश करता है। अमितोष ने बहुत ही सहज रखा है इस नक़ल को भी ,कहीं भी सीमा नहीं लांघी है और एक नयापन दिया है राजकपूर की झलक को जो देखने में सहज लगती  है । फिल्म देखकर समझा जा सकता है कि इस कलाकार ने कितनी तपस्या की होगी इसे साधने में। हम व्यक्तिगत तौर पर उनके क़ायल हो गये। नायिका के रूप में अनुराधा मुखर्जी ने भी पूरा साथ दिया है प्रेम की सरलता और विरलता को दर्शाने में।

संवाद जितने सधे और  सटीक लगते हैं उतनी ही अच्छी टाइमिंग है सभी कलाकारों की। टीम एफ़र्ट साफ़ झलकता है सधी हुई अदायगी में । रास लीला के दृश्य हों या महतो मित्रों की असाधारण जुगलबंदी - सारे के सारे दृश्य प्रशंसनीय हैं।

नायक का सब्जी पकाना और दोस्त के लिए चार आलू बचा के रखना हमें सरलता और मित्रता की पुरानी गली में ले जाता है। पुराने गाने जैसे-" दम भर तो उधर मुँह फेरे ओ चंदा " हो या " हम तुमसे मोहब्बत कर के सनम ", इनका बख़ूबी उपयोग मनोरंजन और दृश्य की सार्थकता के लिए  नपे- तुले अन्दाज़ में किया गया है। 1954-60 के बीच के समयकाल को बहुत ही सूझ बूझ के साथ वास्तविकता की परत लगाए आपके सामने प्रस्तुत किया गया है। इस फ़िल्म पर लिखते समय हमारे मन में कुछ सवालों ने दस्तक दी कि पंचलेट फिल्म दर्शक आख़िर क्यों देखे?
तो जनाब जवाब जो हमने पाया - वह प्रस्तुत है:-


अगर आप शुद्ध मनोरंजन चाहते हैं।
अगर आप अपने गांव को फिर से जीना चाहते हैं।
अगर आप एक सहज और परिपक्व अदाकारी देखना चाहते हैं।
अगर आप टीम की  ताकत और समर्पण देख गदगद होना चाहते हैं।
अगर आप सच और प्यार की जीत देखना चाहते हैं।
अगर आपको साहित्य कला कहानियों से थोड़ा-सा भी लगाव रहा है।
अगर आप कभी जातिवाद से जूझे हों थोड़ा भी।
अगर आप में गाँव की मिट्टी की खुशबू पाने की ललक अब भी बाकी हो ।
अगर आप एक निर्देशक को जिसने अपने 9 साल इस फ़िल्म पर लगा दिए और उसके संघर्ष को  समझने का हौसला रखते हैं।
अगर आप समझना  चाहते हैं कि निर्माता ने इस टीम और कहानी पर पैसा क्यों लगाया?
अगर आप मन में प्रसन्नता, शांति और चित्त में मनोरंजन की तृप्ति चाहते हैं।

तो आप जरूर देखेंगे एक संपूर्ण मनोरंजक और ज़मीन से जुड़ी फिल्म पंचलैट।
अच्छी फिल्म कितनी बार भी देखिये आपका मन नहीं भरता। हमने ये फ़िल्म दो बार देखी। सच जानिये पहली बार जितनी अच्छी लगी दोबारा और ज्यादा अच्छी लगी। कहानी, अभिनय,संगीत ,निर्देशन ,सिनेमाटोग्राफी,संवाद हर किसी ने अपना काम और ज़िम्मेदारी बख़ूबी निभाया है ।
प्रेम मोदी मुबारकबाद के हक़दार हैं इतनी बेहतरीन फिल्म हमारे बीच लाने का साहसिक कार्य करने के लिए। कहते हैं न कि जो चीज आपको बहुत ज़्यादा पसंद हो उसे पाने और देखने की लालसा और बढ़ जाती है। यही हाल हमारे जैसे उन सभी दर्शकों का है जिन्होंने 'पंचलैट'कहानी को पहले पढ़ा है। मैथिल भाषा और कोसी परिवेश की आंचलिकता को पृष्ठभूमि में रखकर इस फ़िल्म में कहानी को सजीव करने का सफल प्रयास किया गया है।

यह फिल्म गांव की परिस्थिति व तात्कालीन सामाजिक वर्जनाओं तथा मुनरी और गोधन की प्रेमकथा पर आधारित है। यह एक ऐसी फ़िल्म है जो उस ज़मीनी हक़ीकत को दिखाती है जो आज भी बिलकुल नहीं बदली है, वही जात -पात , टोला में बंटा हुआ वही समाज का छोटा स्वरूप और देहात में रहने वालों के तौर तरीक़े जिसे बड़े सहज भाव व शालीनता से दर्शाती है पंचलैट। दशकों बाद भी कुछ नहीं बदला है,सब वहीं का वहीं है। रेणु की कहानियों में गाँव की परिकल्पना कोरी कल्पना नहीं है। आज भी पंचलैट की तरह सुदूर उत्तर या दक्षिण बिहार के गाँवों में सलीमा के गाने को कोई गोधन किसी मुनरी को देखकर गाने की मजाल नहीं कर सकता और मजाल कर ले तो वही हश्र होगा जो इस सिनमा में दिखाया गया है। जिसमें वही कौतुहल आज भी है। और सच बताएँ तो यह फ़िल्म आपको आपके बचपन जवानी की एक रोचक सैर कराते हुए यथार्थ तक लाती है।
ज़रूरत है आज इस फ़िल्म को सभी छोटे-बड़े शहरों के सिनेमाघरों और सभी मल्टीप्लेक्स में देखे और दिखाए जाने की ।

काश! यह फ़िल्म जल्द ही वैसे सभी दर्शकों तक पहुँचे जो कड़वे यथार्थ को नहीं पचा पाते हैं। भारत जैसे देश में बात भले ही बुलेट ट्रेन की हो रही है पर शहरों में भागती दौड़ती ज़िन्दगी ने संवादहीनता की जो रेस लगा रखी है  उसका समाधान कुछ हद तक पंचलैट भी है।
सिलेमा के गाने गाता हुआ गोधन और मुनरी के पवित्र प्रेम को उस सदी में मान्यता देती यह कहानी और फ़िल्म आज के युग में अपने दावे के पुरज़ोर समर्थन की माँग निश्चित ही आपसे करेगी।
निराशा को आशा में बदलती है यह फ़िल्म जहाँ एक सुखान्त के साथ आज की दिखावटी दुनिया को आइना दिखाती है वहीं बहुत सारे सवाल भी छोड़ जाती है हम सब के लिए कि इतने विकास के बावजूद हम १९५४ -५५ में ही क्यों खड़े हैं । देश के कई हिस्सों में कुछ क्यों नहीं बदला है। साथ ही और भी बहुत से जहनी सवाल।

आज के हालात देख लग रहा है जैसे यथार्थपूर्ण कहानी को भी  किसी भव्यता का मोहताज़ होना पड़ रहा हो। आधुनिक युग में कला को पीछे धकेल वित्त विभूतियों की दख़ल और रंगभूमि पे अपनी प्रभुता काबिज होने की मुहिम ज़्यादा प्रतीत हो रही है। एक षड्यंत्र लग रहा है मौलिक व कलात्मक कार्य के विरुद्ध। रेणु जी का साहित्य जिस तरह की आंचलिकता के सौंदर्य से ओतप्रोत दिखता है, इस फिल्म में भी उसे वैसा ही बनाए रखने का प्रयास किया गया है, जो दर्शकों के लिए एक अलग अनुभव होगा।

फिल्म से जुड़ी कलाकार कल्पना झा का कहना है कि कई सालों से थिएटर से जुड़ी हूं पर फिल्म का यह पहला अनुभव है। फिल्म से जुड़ना और वह भी साहित्यिक फिल्म में काम करने का अलग ही आनंद है। बचपन से रेणु जी की कहानियों से प्रभावित रही हूं ऐसे में उनकी कहानी पर बनी फिल्म में अभिनय करना सचमुच कल्पना से परे है।

अच्छी कहानियों को जीवंत करने के लिए उनका गंभीर फिल्मांकन बेहद जरूरी है। गौरतलब है कि रेणु  की कहानी मारे गये गुलफामपर बॉलीवुड के गीतकार शैलेंद्र ने तीसरी कसमफिल्म 1966 में बनायी थी।  तीसरी क़सम के बाद आज पंचलैट को एक सार्थक प्रयास माना जा सकता है जिसने कम से कम एक शुरुआत तो ज़रूर की है साहित्य और सिनेमा की कड़ी को जोड़ने की। यह फ़िल्म प्रेरित करेगी हर उस कथाकार को, जिसके अंदर का साहित्यकार और कलाप्रेम दोनो ज़िंदा है,कुछ नया करने के लिए।

विश्वास है कि पंचलैट अपनी पूरी चमक-दमक के साथ जलती रहेगी और अपनी अमिट छाप छोड़ने में कामयाब रहेगी।

समीक्षकद्वय-
स्मिता गोयल

यतीश कुमार












हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad