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Sunday, July 22, 2018

स्मृति शेष कवि नीरज पर डॉ विमलेश शर्मा

मुझे न करना याद, तुम्हारा आँगन गीला
हो जाएगा
डॉ.विमलेश शर्मा


खिलने को तैयार नहीं थी, तुलसी भी जिनके आँगन में
मैंने भर-भर दिए सितारे, उनके मटमैले दामन में
पीड़ा के संग रास रचाया, आँख भरी तो झूम के गाया
जैसे मैं जी लिया किसी से, क्या इस तरह जिया जाएगा।

कवि नीरज के गीतों से, शब्दों से वाकई मन गीला है। यह कवित्व का निकष ही है कि वह भावों  को वहन करने का सामर्थ्य और टूटने का सलीका दोनों ही सहेज पाए। हर जीवन के रोजनामचे से कितना कुछ सहेज लिया जाएगा, कितना कुछ छूट जाएगा यह तो वह जीवन ही देख सकता है। पर कोई असाध्यवीणा की कलम ही सफहों पर सफीना सा लिखा छोड़ जाती है। वस्तुतः कोई विशाल दरख्त सा कवि ही वह सब लिख सकता है, जो आम और खास के मन में उसी तरह धड़के जैसा उसने लिखा है। जीवन के सुरूर से कविता का शऊर सीखने वाले लोग विरले होते हैं, शायद इसीलिए कोई भी कवि अपना सा जान पड़ता है और काव्य -जगत् में प्रसिद्धि भी जल्द ही पा जाता है। कविता ही वह विधा है जो थोड़े से समय में कही  जाती है पर उसका प्रभाव चिरस्थायी होता है। किसी कवि को अपनी कविता पर और भावों पर इतना गरूर हो कि वह निःसृत हुए तो मेरे और पढ़ लिए गए तो दूसरे के तभी वह लोक में पाँव रख सकता है। लेखक को लिखने के लिए बार-बार टूटना होता है। किसी दरकती पंक्ति को लिखने का अर्थ उस कवि से पूछिए जिसने उसे लिखा है। लेखन जब इस प्रकार   जीवन से जुड़ता है तभी समाज उसे हृदयाकाश या सर्वोच्च स्तर तक पहुँचाता है। ऐसे ही एक कवि , शाइर और गीतकार नीरज के गीतों की शोखियों का ही कमाल है कि आज भी उनके बजते ही घरों में मानों शहनाई की धुन बजने लग जाती है।

 कवि नीरज के जीवन को देखें तो वहाँ वेदना के अनेक गह्वर दिखाई देते हैं।   गोपालदास सक्सेना ही साहित्य-जगत् में  'नीरज' बन गया।  इनका जन्म 4 जनवरी 1925 को पूर्व आगरा व अवध, जिसे अब उत्तर प्रदेश के नाम से जाता है के इटावा जिले में हुआ। नीरज को बाल्यकाल में ही पिता का बिछोह झेलना पड़ा था। जीवन के झंझावतों से गुजरते हुए उन्होंने लोक-शिक्षा प्राप्त की। जीविकोर्पाजन के लिए उन्होंने टाइपिस्ट व क्लर्क की नौकरी की। कुछ समय के लिए उन्होंने मेरठ कॉलेज में भी अध्यापन कार्य करवाया। तदनन्तर उन्हें अलीगढ़ धर्म समाज में प्राध्यापक नियुक्त किया गया ।

उनके प्रमुख काव्य संकलनों में संघर्ष (1944), अंतर्ध्वनि (1946), प्राणगीत(1951), बादर बरस गयो(1957), मुक्तकी (1958), नीरज की पाती, गीत भी अगीत, कारवाँ गुजर गया  आदि प्रमुख हैं। अनेक लोकप्रिय गीतों के जनक नीरज के लिख-लिख भेजत पाती (पत्र-संकलन)  और काव्य और दर्शन (आलोचना) को भी जनमानस का प्रेम प्राप्त है।

शायद शृंगार को आलोचक वर्ग रसराज होने पर भी हलके में लेता है , इस क्षेत्र की कविता को उतना सम्मान नहीं मिलता इसीलिए उन्हें भी  शायद शृंगार का कवि कहलाना पसंद नहीं था। यह ठीक है कि वे भी रीतिकालीन स्वच्छंद काव्यधारा की ही तरह प्रेम की पीर के कवि रहे परन्तु प्रेम के साथ-साथ अध्यात्म ने भी उन्हें गहरे तक प्रभावित किया । बीते दिन जो वीडियो तैरते मिले उनमें वे एक काव्य पाठ में कह रहे हैं, "अध्यात्म का मुझ पर बड़ा असर रहा. लेकिन लोगों ने मुझे शृंगार का कवि घोषित कर दिया।” वे यहीं पर आगे कह रहे हैं कि- ( बकौल नीरज)
“आज जी-भर के देख लो चाँद को
क्या पता कल रात आए न आए।”
"तो यहाँ चाँद का मतलब चाँद और रात का मतलब रात थोड़े ही है। यह फिलॉसफी है जीवन की, शृंगार नहीं है।" जीवन और मृत्यु पर लिखना मनुष्य जीवन के सबसे बड़े दर्शन की ही देन है। जब कोई कवि इस पर लिखता है तो यह ठीक है कि दर्द की कारा में उसने बहुत देर निवास किया है, सतत निवास किया है। दुख ही जीवन की कथा रही, यह जीवन को साक्षात् भोगकर ही लिखा जा सकता है, जो कभी छायावाद का भी प्राण-तत्त्व था।
“न जन्म कुछ न मृत्यु कुछ महज इतनी बात है
किसी की आँख खुल गई किसी को नींद आ गई।”

निजी जीवन का एकाकी राग ही रहा होगा जो उन्हें सुरा और कविताई की राह पर ले गया। वे सतत लिखते थे और शायरी में लोकप्रयिता के चरम पर थे। इसी लोकप्रियता के कारण मुम्बई के सिनेमा-जगत् ने उन्हें सहर्ष स्वीकार करते हुए गीतकार के रूप में , ‘नई उमर की नई फसल’ में गीत लिखने का निमन्त्रण दिया। गीत लिखने का यह सिलसिला अनेक वर्षों तक जारी रहा और उन्होंने सिनेमाई जगत् को कई लोकप्रिय, गहन भाव बोध और अन्तश्चेतना से युक्त गीत दिए। यह सच है कि प्रसिद्धि जितनी जल्द आकर्षित करती है उतनी ही जल्द उससे विराग भी जन्म लेता है। व्यामोह या मोहभंग किसी भी राग की नियती है। कवि नीरज के साथ भी यही हुआ । कवि , शाईर व गीतकार गोपालदास नीरज , पहले शख्स रहे जिनको शिक्षा व साहित्यिक रचना-कर्म के लिए दो बार 1991 में पद्म श्री और 2007 में पद्म-भूषण पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। उन्हे यशभारती पुरस्कार और विश्व उर्दू पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया है।

मुशायरों से आम जन का जुड़ाव होता है, वहाँ दर्द और शृंगार ही लोकप्रिय हो सकता है। नीरज के काव्य में यह स्वस्फूर्त था। उनकी कविताओं का जीवन की आलोचकीय दृष्टि से मूल्यांकन करने पर यही निष्कर्ष निकलता है कि कविता सिर्फ भावों की वाहिका है। हर कवि का हृदय जीवनानुभव और जीवन दृष्टि उस कविता का एक खाका तैयार करता है , उसके शब्द भावों से निःसृत होते हैं और आम मन की जनीन पर साधारणीकृत हो अंकुरित होते हैं।

कवि नीरज को अजमेर साहित्य उत्सव में दूर से देखने का मौका मिला। तबीयत नासाज होने के कारण उनका सत्र तब संभव नहीं हो पाया था। काँपते हाथों से उन्होंने दीप-प्रज्ज्वलित किया पर उसकी लौ का उजास देखते ही बनता था। शाइर तब भी गम से मुक्त होने के लिए चुने हुए अपने शागिर्द के साथ थे, पर एक स्मित उनके मुख-मण्डल पर तब भी कायम थी। उस वक्त भी जेहन में ये पंक्तियाँ ही थीं-
मेरा मकसद है के महफिल रहे रोशन यूँही,
खून चाहे मेरा, दीपों में जलाया जाए।
नीरज होना आसान तो नहीं है,हाँ नीरज पर बात करना आसान ज़रूर है। कवि, कविताई को चुनने का अधिकार पाठक को है, कोई भी आलोचना किसी भी कवित्व के प्रति पूर्ण और सार्वभौमिक राय नहीं रख सकती। फिर कवि नीरज को उनके रचना कर्म से उनके गीतों से ही हम जी पाएँ तो बेहतर होगा-
इतने बदनाम हुए हम तो इस ज़माने में, लगेंगी आपको सदियाँ हमें भुलाने में।
न पीने का सलीका न पिलाने का शऊर, ऐसे भी लोग चले आये हैं मयखाने में॥ (नीरज)

विमलेश शर्मा युवा कवि-समीक्षक एवं प्राध्यापक हैं।

हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

Wednesday, July 18, 2018

कविता संवाद - 3



युवा कवि आनन्द गुप्ता के प्रश्न और अग्रज कवि बोधिसत्व के जवाब

 
बोधिसत्व
(1) नई सदी में युवाओं की कविता को आप किस दृष्टि से देखते हैं ? आज की युवा कविता में पहले से क्या भिन्नता है?

इस एक प्रश्न में दो प्रश्न शामिल हैं। पहले प्रश्न के उत्तर में यह कहना है कि आज की युवा कविता हड़बड़ी और उत्तेजना की कविता है। वह कवि क्रोध में है लेकिन क्रोध को सही दिशा नहीं दे पाने के कारण वह सबसे या तो खिन्नता प्रकट कर रहा है या प्रश्न कर रहा है। कवि के मैं का एक रीतिकाल सा बन गया है। आज के कवि का मैं पिछे के कवि के के मैं से भिन्न नहीं मात्र विस्तार या प्रसार है। कविता में आने वाला मैं एक रोग का रूप ले चुका है। पीछे की कविता में भी मैं था किंतु कभी कभार वह मैं का स्वर विराम भी पा जाता था। पीछे की कविता से भिन्नता के नाम पर ऐसा कोई बड़ा भेद नहीं अर्जित कर पाई है युवा कविता। अगर बात कठोर न लगे तो मैं कहना चाहूँगा कि वह एक प्रकार से अपनी पिछली पीढ़ी की अनुगामिनी ही होके रह गई है या प्रतिलिपि की तरह है। यदा कदा कुछ कवि एक अलग मुद्रा लेते दिखते हैं। लेकिन वे भी शीघ्र ही शामिल बाजा बजाने लगते हैं। मैं जिन कुछ कवियों का नामोल्लेख करना चाहूँगा जिनकी कविता पिछली पीढ़ी से अलग दिखती है। वे हैं राकेश रंजन, अदनान कफील दरवेश व्योमेश शुक्ल,  विवेक निराला, अंशुल त्रिपाठी, अनुज लुगुन। खेद की बात है कि मेरे गिनाए नामों में मैं किसी कवयित्री का नाम नहीं शामिल कर पा रहूँ।   

     आज की कविता को बाज़ार ने कितना प्रभावित किया है ?

आज की कविता बाजार से प्रभावित नहीं बल्कि आक्रांत है। हालाकि आक्रांत होना भी एक प्रकार से प्रभावित होना ही है। कविता का विकट और तनिक धुंधला पक्ष यह है कि वह बाजार में रह कर भी बाजार की विसंगतियों से विचलित होने के स्थान पर उससे बेखबर सी है। ऐसा लगता है कि कवि के समय का बाजार किसी दूसरे ग्रह को ग्रस रहा है। हुआ यह है कि बाजार से लड़ने की मुद्रा में कविता केवल भंगिमा तक सीमित हो गई है। जबकि यथार्थ बेहद कराल है, क्रूर है और कविता का उद्देश्य केवल संघर्ष करना भर ही नहीं है।

    क्या आपको लगता है कि सोशल मीडिया ने आज की युवा कविता को एक नई दिशा और ज़मीन दी है ?

सोशल मीडिया ने युवा कविता को बेशक एक नई दिशा और जमीन दी है। अब वह दिशा कितनी धूसर और जमीन कितनी दलदली है या कितनी बंजर है या कितनी नोना मिट्टी वाली है यह तय होना बाकी है। असल में सोशल मीडिया में इतनी चकाचौंध है कि एक नहीं कई-कई पीढ़िया एक साथ डूब उतरा रही हैं। खास कर युवा और युवतर कविता रचनेवाला वर्ग का सब कुछ विराट भव्यता में ऊभ-चूभ कर रहा है। उम्मीद की जानी चाहिए कि युवा वर्ग सोशल मीडिया को आत्मरति के ऊपर जाकर अपने लिए एक व्यापक सामाजिक सरोकार के मंच के रूप में उपयोग करेगा। क्योंकि ऐसी सामाजिक संवेदना और लगाव के लिए खुली खिड़की पिछले किसी युग में कला साहित्य के किसी माध्यम को प्राप्य न थी।

        नयी सदी में बड़ी संख्या में कवि अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं , इसके क्या कारण हैं ?

यह बड़ी संख्या मीडिया खास कर सोशल मीडिया के कारण सामने आ पा रही है। समय और समाज को तकनीकी बदलाव का बड़ा आधार मिला है। अपनी बात कहने और बिना किसी संपादक-पत्रिका-प्रकाशन संस्थान का मुंह देखे कवि सीधे अपना प्रकाशक-संपादक और प्रकाशन संस्थान स्वयं हो गया है। ऐसे में आने वाले दिनों में कवियोंकी संख्या में अनेक स्तरीय वृद्धि देखने को मिलेगी। पिछली हो चली पीढ़ी के कवियों संपादकों को ऐसे अचानक और बिना बुलाए आ रहे कवियोंके लिए उनका उचित स्थान देने पर हार्दिक विचार करना चाहिए। जब मैं कवियों कह रहा हूँ तो इसमें कवयित्रियों को भी शामिल माना जाए।  

        आज की कविता  में लोक संवेदना का कितना विस्तार हुआ है ?

आज की कविता में लोक संवेदना का विस्तार मेरे अनुसार कम हुआ है। कविता का स्वर अधिक नागर और सुसंस्कृत हुई । प्राकृत और देसज का संसार संकुचित हुआ है। लोक संवेदना भी शास्त्रीयता को प्राप्त होती लग रही है। पिछली पीढ़ी के कवियों ने भी लोक की संवेदना को बेहद किताबी मानकों तक सीमित किया है। वैसे तथ्य यह है कि लोक में भी लोक कहाँ बहुत शेष रह गया है। बल्कि लोक में से लोक विलुप्त होता प्रतीत हो रहा है।  
               
                                             युवा कविता में विचारधारा की क्या जगह है ?

युवा कविता बहुत तेजी से तात्कालिकता के प्रभाव में आई है। अगर यहाँ विचारधारा से तात्पर्य प्रगतिशीलता या मार्क्सवाद से है तो यह एक चिंतित करनेवाली बात है कि आज का युवा अध्ययन को गंभीरता से शायद नहीं लेता। मैंने निजी तौर पर अनेक कवियों से यह जानने की कोशिश की कि वे पुराना साहित्य और वैचारिक गंभीरता के लिए के लिए क्या पढ़ रहे हैं तो यह रहस्य सामने आया कि वे तो पिछला साहित्य नाम मात्र के लिए ही पढ़ रहे हैं और विचारधारा के प्रवाह से वे किंचित मुक्त हो चले हैं। वह दिन दूर नहीं कि शायद युवा यह कहने लगें कि उनकी कोई विचारधारा नहीं। यानी हम उस मुहाने पर खड़े हैं जबकि युवाओं की विचारहीनता ही उनके लिए एक महाविचार का रूप ले ले।  

        कविता कोकिस हद तक प्रतिरोध के सांस्कृतिक औज़ार के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है और किस हद तक इसका लक्ष्य सौंदर्यबोध है ?

कविता अगर स्वभाविक रूप से प्रतिरोध का औजार या अस्त्र बने तो इससे बेहतर क्या और अगर उसे योजना बद्ध तरीके से प्रतिरोध का औजार या अस्त्र बनाया जाए तो उसके लिए इससे अधिक धोखाधड़ी और क्या हो सकती है। क्योंकि कविता जनता के लिए अस्त्र और औजार से अधिक रही है। वह सांस्कृतिक संजीवनी रही है। प्राण वायु और सभ्यता का साकार सत्य रही है। यह कविता का सबसे कठिन अवमूल्यन है कि वह समाज में एक टूल की तरह इस्तेमाल हो। हो सकता है अनेक लोग या कवि स्वयं कविता को अस्त्र बना कर खुश हों कितना कविता तो अनेक उद्देश्यीय अवदान है जो कि हजारों साल से समाज के हारे गाढ़े काम आती रही है। समाज को केवल संघर्ष ही नहीं सुख में आत्मरति के पालने से बाहर लाती रही है। इसीलिए लोक का साराय गायन सामूहिक कंठ में फूटता और विस्तार पाता है। कविता यदि अस्त्र या औजार बन कर हीनता को प्राप्त होती है तो वह केवल सौंदर्य की भी वस्तु नहीं। कविता शोभाकर नहीं। यहीं कविता चित्रकला और मूर्तिकला या संगीत से अपना दायरा बड़ा कर लेती है। वह समाज के सौदर्य का नहीं बल्कि समाज के मन का सौंदर्य विस्तार करती है। और समाज के मन में अनेक लोक शामिल रहते हैं। इसलिए मैं जोर देकर कहना चाहूँगा कि कविता को तात्कालिक उद्देश्य परकता से मुक्त किया जाना चाहिए।वह न मनोंजन का साधन है न सौंदर्य का न प्रतिरोधी अस्त्र और औजार ही है। कविता एक सांस्कृतिक औषधि है जो कभी संजीवनी बनती है तो कभी संवेदना का स्वर। इसके बाद वह संघर्ष के काम आए तो सोने पर सुहागा।   

नई सदी की कविता का ईमानदार , प्रामाणिक और समग्र मूल्यांकन अभी बाकी
है, इस संबंध में क्या संभव है ? यह किसकी व्यर्थता है कवि की या आलोचक की ?

इस प्रश्न में भी एक साथ दो या तीन प्रश्न शामिल हैं। नई सदी की कविता ने तो अभी केवल 18 साल की ही यात्रा पूरी की है। अभी तो पिछली सदी के उत्तरार्ध की कविता का भी कोई गंभीर और सार्थक मूल्यांकन कहाँ हो पाया है। या कहें कि कोई प्रामाणिक मूल्यांकन कहाँ हुआ है। पिछले पचास साल की कविता का जिसमें इस सदी के ये 18 साल भी शामिल हैं मूल्यांकन के लिए प्रतीक्षारत हैं। लेकिन यह समय स्फुट समीक्षकों का है। आलोचक तो कोई है नहीं । आज की युवा पीढ़ी के साथ यह परम दुर्योग घटा है कि उसके अपने आलोचक नहीं। रास्ता एक ही है कि कवि अपनी कविता के लिए स्वयं आलोचक की भूमिका तय करे। अगर हम याद करें तो पाएँगे कि छायावादी कवियों ने अपनी कविता की आलोचना के लिए अपने को आलोचक बनाया था। फुटकर समीक्षकों के बूते आजकी युवा कविता का समग्र आंकलन कर पाना संभव बी नहीं रह गया है। आलोचक चूक गए हैं। और उनकी आलोचना दृष्टि पर युवा कवि और उनकी कविता ने इतनी धूल उड़ा दी है कि वे हताश से आलोचक की जगह दर्शक में दब्दील हो गए हैं। 

                 समाज में कविता की उपयोगिता कितनी बची है?

आदिम काल से लेकर आज तक जो भी समाज हो वह सुख में हो या दुख में हो वह तो गाएगा, गुनगुनाएगा, मंत्र की तरह बुदबुदाएगा, भजेगा, जपेगा, उच्चारेगा । कभी स्फुट कभी सस्वर कभी आलाप में तो कभी अजपाजाप में। उसके लिए आज की कविता सटीक न बैठी तो वह अदेर पुरानी कविता को साध लेगा। वह भी न हुई तो लोक से कुछ निकाल लाएगा। लोक ने साथ न दिया तो वह कुछ गढ़ लेगा। ऐसा कौन सा प्रयोजन है जिसमें कविता को स्थान न दिया गया हो। कभी मंगल गान के रूप में कभी मांगलिक मंत्र के रूप में। जन्म से मरण तक कविता का आवरण कविता की छाया साथ रहती है। समाज में अनेक स्तरों पर कविता ने नेक रूपों में अपना होना सुनिश्चित किया है । छंद-मंत्र-श्लोक-कवित्त-आल्हा-बिरहा-कव्वाली-गजल-शेर-दोहाइन तमाम और अनगिनत शैलियों में कविता का स्थान है। अव यह आज की कविता पर निर्भर करता है कि वह अपने लिए व्यापक और विविध समाज में कोई स्थान बना ले या स्वयं कठिन काव्य का प्रेत हो कर मिटा ले। यह कविता के साथ कवियों पर भी निर्भर करेगा कि वे कविता एक असामाजिक उत्पाद बना दें या संजीवनी।



आनन्द गुप्ता

साभार - वागर्थ, कोलकाता
हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

Thursday, July 12, 2018

यतीश कुमार की कविताएँ


यतीश कुमार

यतीश कुमार की कविताएँ इस लिए रूहानी लगती हैं क्योंकि इनके कवि को कृत्रिमता छू तक नहीं पाई है – यही इस कवि की मौलिकता है। आज जब कविताएँ पढ़-पढ़कर कविताएँ लिखने का चलन बढ़ता जा रहा है यह कवि शिल्प के फेरे में न पड़कर अपने अनुभव और स्मृतियों को कविता में लागातार ढाल रहा है। दीगर बात यह कि प्रस्तुत कविताएँ ही इस तथ्य की पुष्टि करने के लिए काफी हैं कि कवि ने अपनी भाषा स्वयं निर्मित की है और समय की विसंगतियों से लागातार मुटभेड़ करने में जुटा हुआ है।

अनहद पर पहली बार इस कवि से परिचय करना सुखद है और इस बात की आस्वस्ति भी कि मौलिकता थोड़ी रूखर हो सकती है लेकिन वह काल की सीमा को अतिक्रमित करने की योग्यता भी रखती है। यतीश कुमार को अनहद की ओर से बहुत बधाई। और हाँ, आपकी बेवाक प्रतिक्रियाओं का इंतजार तो रहेगा ही।





देह के मोती

कभी कभी कुछ पल
ऐसे होते है
जिनमें पलकें खोलना
समंदर बहाने जैसा होता है
उन पलों में आप और लम्हे
एक साथ सैकड़ों नदियों में
हज़ारों डुबकियाँ लगा रहे होते हैं

कभी लम्हा सतह से उपर
और कभी आप
लम्हों और आपके बीच की
लुक्का -छुप्पी , डुबकियाँ
सब रूमानी- सब रुहानि
फिर आप जैसे समंदर पी रहे हों
और नदियाँ सिमट रहीं हों
आपका फैलाव असीमित
सब कुछ समेटने के लिए

फिर एक लम्हे में छुपे हुए सारे समंदर
और उनमें छुपी सैकड़ों नदियाँ
आप छोड़ देते हैं बहते

लम्हे बिलकुल आज़ाद हैं अब
छोड़ देना आज़ाद कर देना
सुकून की हदों के पार ला रखता है आपको
आप जैसे खला तक फैल कर
फिर ज़र्रे में सिमट रहे हों

बिखरते हर लम्हे ऐसे लगते हैं
जैसे आप के अस्तित्व के असंख्य कण
आपसे निकल कर
अंतरिक्ष के हर नक्षत्र को टटोलते फिर रहे हों
पूरे ब्रह्मांड में आपका फैलाव
हावी हो रहा हो
जैसे हर लम्हा आपसे झूटकर
जाता  हो ईश्वर को छूने
देवत्व का टुकड़ों में हो रहा हो
स्वाभाविक वापसी

जगमगाते लम्हे, टिमटिमाते लम्हे
अंतरिक्ष में असंख्य सितारे
और ऐन उसी पल उगते हैं
देह पर असंख्य नमकीन मोती
ब्रह्मांड भी कभी धरती पर
समाता है एक शरीर के बहाने

हर ज़र्रा, हर लम्हा, शरीर का हर मोती
कायनात को रचने की क्षमता रखता है

प्रेम भरे पल में रीता एक लम्हा भी
सृष्टि रचने की क्षमता रखता है ।



मैं ख़ुश हूँ

मैं ख़ुश हूँ
मैं एक जगह खड़ा हूँ
जहाँ से मुझे ग़म दिखता नहीं
ख़ुद में

मैं तरंगित हूँ
और मुझमें रोज़
नई तरंगे उन्मादित
उदित हो रही हैं
मैं उनके कम्पन का स्पंदन
अपने हर रोम में महसूस करता हूँ
फिर उन कम्पनों को
उन लोगों में बाँटता हूँ
जो पाषाण हो चले हैं
जो निर्जीव अवस्था
की ओर यात्रा कर रहे हैं
वे चल रहे हैं किसी अनजान नियति के वशीभूत

पर मेरी नियति का क्या?

मैं तो तरंगित हूँ
उन्मादित उत्तेजित हूँ
कल-कल नदी जैसा
मधुर गीत अंदर
बहता रहता  है
मैं भी बहता रहता हूँ
दूसरे के ग़म उधार लेता हूँ
बदले में थोड़ा प्यार देता हूँ

बड़े आश्चर्य में हूँ
ग़म लेना तुम्हें
हल्का कर देता है
तुम्हारे भीतर एक जगह
ख़ाली कर देता है
और ज़्यादा प्यार भरने के लिए
तो इसका मतलब ये हुआ कि
प्यार पालना और  रखना
ज़्यादा भारी है

प्यार देने से ग़म लेने से
भीतर हल्का जो लगता है

गंगा अभी भी जीवित है
संसार से इतने ग़म ले के
और इतना ज़्यादा प्यार देके
कल कल बह तो रही है आज भी

और यकीन कीजिए
मैं ख़ुश हूँ ।


नंगापन

कुछ खोता जा रहा है मेरा
अस्तित्व की ओस गर्म हवा के सम्पर्क में आ रही है
और अंश-अंश  उड़ती जा रही है
अपने ही सिद्धांत और स्वार्थ का संघर्ष
अपनी ही आँखो के सामने दिख रहा है

कभी ख़ुद को अंदर से नंगा महसूस किया है?

महसूस नहीं देखने की बात कर रहा हूँ मैं
मैंने देखा है ख़ुद को नंगा अंदर से
जब अस्तित्व आहिस्ता आहिस्ता
अंदर से खोखला होता जाता है
तो अंततः
आप ख़ुद को नंगा महसूस करते हैं

कभी स्पर्शों से सिद्धांत बनाया है?

मैंने बनाया है स्पर्शों का सिद्धांत
बचपन के बनाए उन पवित्र सिद्धांतों
की क़ब्र भी बनायी है मैंने

आदमी पहले बातों से सिद्धांत बनाता है
फिर लिखकर और अंत में थककर आँखो
के सिद्धांत बनते हैं

पर मैंने स्पर्शों के आधार पर
ख़ुद के जीने का सिद्धांत बनाया है
पर क्या करूँ कि  छोटी -छोटी बातें
छोटे- छोटे स्वार्थ छोटे- छोटे दीमक मेरे
सिद्धांतों के ग्रंथ को चट करते जा रहे हैं
शायद कुछ खोता जा रहा है मेरा
और जो बचा है
उसे इंतज़ार है सिर्फ तुम्हारे स्पर्श का

शायद कुछ खोता जा रहा है मेरा
दिल दिमाग़ जिगर ग़ुर्दा ख़ून क्या
आख़िर क्या खोता जा रहा है मेरा ?

वास्तव में ये सारी चीज़ें अंदर से
अपने अपने आयत में कमी करती जा रही हैं
और मेरे अंदर के पोशाक को घिस -घिस कर
नंगा करने की कोशिश कर रही हैं
यह समय भी अजीब है
इसके पास सिर्फ़ तीन कपड़े हैं -

भूत,वर्तमान और भविष्य
और
इन तीन कपड़ों के बनने की
प्रक्रिया भी अजीब है

एक दिन के आकार का धागा
आगे की ओर आकर लगता है
दूसरा उसी आकार का धागा
पीछे से निकल जाता है
कपड़े की लम्बाई चौड़ाई
एक समान ही रह जाती है

पर कुछ लोग ऐसे भी होते हैं
जो इन कपड़ों के बनने की प्रक्रिया
को जानने के चक्कर में पूरे
कपड़े को उधेड़ डालते हैं और ख़ुद को
नंगा कर डालते हैं

शायद कुछ खोता जा रहा है मेरा

और जो बचा है उसे इंतज़ार है
तुम्हारी पोशाक का
ताकि मेरा नंगापन फिर से
उधेड़ा जा सके ।

शहर से बड़े बादल

उपर आसमान से उड़ते वक़्त
नीचे शहर चीटियों सा रेंगता दिखता है
और बादल विशाल समंदर सा
समूहों में गुँथा गुँथा

लगता है अनन्त खलाओं में
बादलों ने क़ब्ज़ा कर रखा है।
उनकी मिल्कियत के आगे
नीचे का शहर बौना दिखता है

ये मस्त मौला हाथियों के समूह हैं
अपनी धुन में हवा के रूख पे सवार
दुनिया से बेख़बर अपनी दुनिया में

उनकी नज़र से देखो तो
हमारे बनाए नदी नाले
जिसके भरोसे हम विकास
और माडर्न ड्रेनेज सिस्टम
का झूठा हवाला देते हैं
बिलकुल सफ़ेद झूठ है

दोनों के बीच कोई सामंजस्य
या पर्याप्तता नहीं दिखती
हाँ इनके बीच एक
मौन समझौता है
अनकही वादों की डोरें बंधी हैं
एक अदृश्य मरासिम के हवाले से
बादलों ने हमेशा
निभाये हैं वो सारे करार
कि अपने समय पे आना है
मौसम अनुसार जितना चाहो
बिना माँगे बौछार कर जाना है
जल ही जीवन है और
शुद्धता की विशुद्ध गारंटी

पर क्या करें कि  हम इंसान हैं
दुनिया के सबसे विचित्र जानवर
सबसे कम भरोसेमंद

वादों के डोरों में असंख्य धागे थे
हर एक ने समय समय पे नोचा
एक एक धागा ग़ुब्बारे में लगाकर उड़ाया
बादलों ने बहुत धीरज दिखाया
वो बादल जो वादों के डोर से जुड़े थे
बिखरने लगे सब्र की दीवारों में दरार आ गयी

वे भी क्या करें

ढहती दीवार का संतुलन
कहाँ सँभलता है

जिस शहर ने जितनी डोरें
तोड़ी हैं उतना ही भुगतना है
चाहे चेन्नई हो या मुंबई
या फिर पूरा झारखंड
ना जाने कब पूरे भारत
की बारी आ जाए

इस खेल में डोर तोड़ना आसान है
फिर गाँठे लगाना बहुत मुश्किल

ये मरासिम हैं
कोई आँत की नाड़ी नहीं
कि यहाँ काटा वहाँ जोड़ा

दर्द और प्यार के रिश्ते हैं
ज़रा सँभल के दोस्त,खीचों मत
सामंजस्य बनाए रखो एतमाद का मामला है
ना जाने कब तुम्हारा शहर
करबला बन जाए और तुम यज़ीद ।


ख़्याल भी एक मर्ज़ है

ख़याल भी अजीब मर्ज़ है
इसकी अपनी फितरत है

अक्सर ख़्याल बिस्तर पे
अर्ध निंद्रा में
हौले से प्रवेश करता है
और एक साथ
सैकड़ों ख़याल
दनादन ज़हन के दरवाज़े पे
मन के साँकल खड़काते हैं
खट खट खट खट

और तब और ज़्यादा तीव्र
हो जाते हैं जब महबूब
तुम्हारे दरमियान हो
एक दिन इसी सोच में लिख डाला कि
किसको तवज्जो दूँ  पहले, कमबख़्त
ख़याल और महबूबा एक साथ लिपटतें क्यों हैं।


ख़याल दौड़ते भी हैं
पीछा करते हैं
झट से एक हुक फँसा कर
मेरी गाड़ी के पिछले सीट पर
चुपके से विराजमान हो जाते हैं
और रेंगते हुए आहिस्ता से
दिल में दस्तक देते हैं तब
जब कभी भी आप
अकेले ड्राइव कर रहे हों और
कोई पुराना गीत बज रहा हो

इनके मिज़ाज का क्या
कभी तो भरी महफ़िल में
किसी ख़ास मुद्दे पे बहस
के बीच टपक पड़ते हैं
बात बात में
आपकी बात काट देते हैं
फटकारो तो दुबक जाते हैं

ये अजीब फ़ितरत है इनकी
जब इन्हें आग़ोश में लेने
की तमन्ना करो  तो
फिसल जाते  हैं

जब कहता हूँ कल आना
तो लिपटते हैं
अजीब आँख मिचौली है
और अंततः जब सबसे हार के
ख़ुद से टूट के अपने ही
ग़रेबान से लिपटता हूँ और
क़मीज़ की आस्तीन भिंगोता हूँ
तो कोई चुपके से लिपटता है
कहता है मैं हूँ तुम्हारा जुड़वाँ
मुझसे नाराज़ न हुआ करो
मैं तो यहीं था
तुम्हारे पास बिलकुल तुम्हारे पास

और फिर मेरी क़लम
मेरी नहीं होती
ख़्वाबों और ख़्यालों की हो जाती है ।



 घर का कोना

एक कोना  है घर का
जो सारे घर को साफ़ रखने  के लिए
क़ुर्बानी देता रहता है

बचपन लिए टूटे खिलौने
ख़ुशबू में डूबे पुराने कपड़े
इश्क़ की अंगड़ाई वाले लिहाफ़
रिश्तों से ज़्यादा उलझे ऊन
तक़दीर से ज़्यादा चीथडी किताबें
और न जाने क्या क्या छुपाए है
वह कोना
सारी उलझी यादों
का सोपान है संग्रहालय भी है
पूरे घर की पसंद नापसंद
का ज़िंदा सबूत
एक कफ़स में बंद पालतू  तोता
ज़रूरत पड़ने और ग़लत वक़्त पर
अपना मुँह खोलता हुआ

वह कोना बचपन जवानी बुढ़ापा
सब समेटे ऐसे तकता है
जैसे मृत त्वचा शरीर में रहकर ताक रही है
वह ऐसा हिस्सा जिसका सबको पता है
और पता नहीं भी है

मन के अंदर भी एक कोना ऐसा ही है
मृत स्थिति लिए जिसका होना न होना
अखरता नहीं है
खटकता नहीं है

पर कभी कभी जैसे मानो
दिवाली आ जाती है
और वह कोना बोलने लगता है
यादों पर पड़ी धूल
छटने लगती है
बचपन खेलने लगता है
जवानी इठलाने लगती है
बुढ़ापा खिलखिलाने लगता है

और हम उन यादों को
कभी आँखें मूँदे कभी आँखे खोले
देखते रहते हैं
एक मुस्कुराहट ,एक गुदगुदी
कभी भीतर होती है
कभी होंठों पर आती दिखती है

कोना भी थोड़ा हँस देता है ।
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यतीश कुमार 1996 बैच के आईईएस अधिकारी हैं। वर्तमान समय में ब्रैथवेट एवं कम्पनी के अध्यक्ष एवं प्रंबंध निदेशक के रूप में कार्यरत हैं।
संपर्कः  yatishkumar93@rediffmail.com
 



हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad