Search This Blog

Friday, June 8, 2018

मदारीपुर जंक्शन पर ओम निश्चल



मदारीपुर जंक्शन : बालेन्दु  द्विवेदी




व्यंग्यात्मक उपन्यासों की कड़ी में एक और सशक्त किस्सागोई
ओम निश्चल

कभी राग दरबारीआया था तो लगा कि यह एक अलग सी दुनिया है। श्रीलाल शुक्लन ने ब्यू-रोक्रेसी का हिस्सा- होते हुए उसे लिखा और उसके लिए निंदित भी हुए पर जो यथार्थ उनके व्यं-ग्य्विदग्धा विट से निकला, वह आज भी अटूट है; गांव-देहात के तमाम किरदार आज भी उसी गतानुगतिकता में सांस लेते हुए मिल जाएंगे। तब से कोई सतयुग तो आया नही है बल्किै घोर कलियुग का दौर है । इसलिए न भ्रष्टाएचार पर लगाम लगी, न भाई भतीजावाद, न कदाचार पर , न कुर्सी के लिए दूसरों की जान लेने की जिद कम हुई। इसलिए आज भी देखिए तो हर जगह राग दरबारीका राग चल रहा है। कहीं द्रुत-कहीं विलंबित । लगभग इसी नक्शे कदम पर चलने का साहस युवा कथाकार बालेन्दुक द्विवेदी का उपन्याुस '' मदारीपुर जंक्श्न'' करता है। मदारीपुर जंक्शहन जो न गांव रहा न कस्बाद बन पाया। जहां हर तरह के लोग हैं जुआरी, भंगेडी, गंजेड़ी, लंतरानीबाज, मुतफन्नीस, ऐसे-ऐसे नरकट जीव कि सुबह भेंट हो जाए तो भोजन नसीब न हो।

मदारीपुर पट्टियों में बँटा है। अठन्नीु, चवन्नीह और भुरकुस आदि पट्टियों में। यहां लोगों की आदत है हर अच्छेो काम में एक दूसरे की टांग अड़ाना। लतखोर मिजाज और दैहिक शास्त्रा र्थ में यहां के लोग पारंगत हैं। गांव है तो पास में ताल भी है जो जुआरियों का अड्डा है। पास ही मंदिर है जहां गांजा क्रांति के उदभावक पाए जाते हैं। एक बार इस मंदिर के पुजारी भालू बाबा की ढीली लंगोट व नंगई देख कर औरतों ने पनही-औषधि से ऐसा उपचार किया कि फिर वे जीवन की मुख्य  धारा में लौट नहीं पाए। याद आए काशीनाथ सिंह रचित रेहन पर रग्घू के ठाकुर साहब जिनका हश्र कुछ ऐसा ही हुआ। हर उपन्याहस की एक केंद्रीय समस्या  होती है। जैसे हर काव्यन का कोई न कोई प्रयोजन । हम सामाजिक और राजनीतिक यथार्थ की ज़मीन पर मैला आंचलपढ चुके हैं, राजकृष्ण मिश्र का दारुलसफासचिवालयपढ़ चुके हैं, विभाजन की ज़मीन पर आधा गांवपढ चुके हैं। गांव और कस्बे  जहां जहां सियासत के पांव पड़े हैं, ग्राम प्रधानी,ब्लाआक प्रमुखी और विधायकी के चुनावों के बिगुल बजते ही हिंसा व जोड तोड शुरु हो जाती है। हर चुनाव में गांव रक्तरंजित पृष्ठभूमि में बदल जाते हैं। इसलिए कि परधानी में लाखों का बजट है, पैसा है, लूट है। सो मदारीपुर जंक्शंन के भी केंद्र में परधानी का चुनाव है।

परधानी का चुनाव मुद्दा है तो अवधी कवि विजय बहादुर सिंह अक्ख ड़ याद हो आए –'कब तक बुद्धू बनके रहबै अब हमहूँ चतुर सयान होब। हमहूं अबकी परधान होब।'

एक कवि ने लिखा है, ‘नहर गांव भर की पानी परधान का।सो इस गांव में भी भूतपूर्व प्रधान छेदी बाबू, वर्तमान प्रधान रमई, परधानी का ख्वाबब लिये बैरागी बाबू, उनकी सहायता में लगे वैद जी, दलित वोट काटने में छेदी बाबू के खड़े किये चइता, केवटोले कें भगेलूराम, छेदी बाबू के भतीजे बिजई ---सब अपनी अपनी जोड तोड में होते हैं। ऐसे वक्त। गांव में जो रात रात भर जगहर होती है, दुरभिसंधियां चलती हैं, तरह तरह के मसल और कहावतें बांची जाती हैं वे पूरे गांव की सामाजिकी के छिन्नु-भिन्नम होते ताने बाने के रेशे-रेशे उधेडती चलती हैं। श्रीलाल शुक्ली ने रागदरबारीमें कहा था---'यहां से भारतीय देहात का महासागर शुरु होता है ।' यह उसी देहात की बटलोई का एक चावल है।

कभी समाजशास्त्री  पी सी जोशी ने कहा था कि रागदरबारीया मैला आंचलजैसे उपन्यासों को समाजशास्त्री य अध्योयन के लिहाज से क्योंब नही पढा जाना चाहिए। आजादी के मोहभंग से बहुत सारा लेखन उपजा है। राग दरबारीभी, मैला आंचल भी, विभाजन के हालात पर केंद्रित आधा गांवमें भी गंगोली गांव कोई मदारीपुर, शिवपालगंज या मेरीगंज से बहुत अलग नहीं है ।

विमर्शों के लिहाज से देखें तो दलित विमर्श, स्त्रीे विमर्श दोनों मदारीपुर में नजर आते हैं। एक सबाल्टोर्न विमर्श भी है कि आज भी सवर्ण समाज की दुरभिसंधियां आसानी से दलितों को सत्ताट नही सौंपना चाहतीं, लिहाजा वह उनके वोट किधर जाएं, कैसे कटें, इसके कुलाबे भिड़ाता रहता है। यहां परधानी के चुनाव में बुनियादी तौर से दो दल हैं एक छेदी बाबू का दूसरा बैरागी बाबू का। पर चुनाव के वोटों के समीकरण से दलित वर्ग का चइता भी परधानी का ख्वाबब देखता है और भगेलू भी। पर दोनों छेदी और बैरागी के दांव के आगे चित हो जाते हैं। चइता को छेदी के भतीजे ने मार डाला तो बेटे पर बदलू शुकुल की लडकी को भगाने के आरोप में भगेलू को नीचा देखना पड़ा ।पर राह के रोड़े चइता व भगेलू के हट जाने पर भी परधानी की राह आसान नहीं। हरिजन टोले के लोग चइता की औरत मेघिया को चुनाव में खड़ा कर देते हैं । दलित चेतना की आंच सुलगने नहीं बल्कि  दहकने लगती है जिसे सवर्ण जातियां बुझाने की जुगत में रहती हैं।--- और संयोग देखिए कि वह दो वोट से चुनाव जीत जाती है। पर चइता की मौत की ही तरह उसका अंत भी बहुत ही दारुण होता है। लिहाजा जब जीत की घोषणा सुन कर पिछवाड़े पति की समाधि पर पहुंचती है पर जीत कर भी हरिजन टोले के सौभाग्या और स्वापभिमानी पीढ़ी को देखने के लिए जिन्दाै नही रहती। शायद आज का कठोर यथार्थ यही है।

कहना यह कि सत्ताम की लड़ाई में दलितों की राह आज भी आसान नहीं। वे आज भी सवर्णों की लड़ाई में यज्ञ का हविष्यक ही बन रहे हैं। आज गांव किस हालात से गुजर रहे हैं, यह उपन्यास इसका जबर्दस्त जायज़ा लेता है। बालेन्दुे द्विवेदी गंवई और कस्बाकई बोली में पारंगत हैं। गांव के मुहावरे लोकोक्तिलयों सबमें उनकी जबर्दस्तद पैठ है। चरित्र चित्रण का तो कहना ही क्या । पढ़ते हुए कहीं श्रीलाल शुक्लम याद आते हैं, कहीं ज्ञान चतुर्वेदी तो कहीं परसाई भी । कहावतें तो क्या  ही उम्दाश हैं :'घर मा भूंजी भांग नहीं ससुरारी देइहैं न्योवता।'

ओम निश्चल
कुल मिला कर दुरभिसंधियों में डूबे गांवों के रूपक के रुप में मदारीपुर जंक्शन इस अर्थ में याद किया जाने वाला उपन्यास है कि दलित चेतना को आज भी सवर्णवादी प्रवृत्तियों से ही आँका जा रहा है। सबाल्टर्न और वर्गीय चेतना भी आजादी के तीन थके हुए रंगों की तरह विवर्ण हो रही है। गाँवों को सियासत ने बदला जरूर है पर गरीब दलित के आँसुओं की कोई कीमत नहीं। बालेन्दु द्विवेदी ने यहाँ लाचार आँसुओं को अपने भाल पर सहेजने की कोशिश बड़ी ही पटु भाषा में की है, इसमें संदेह नहीं।
                                -----
                                                       आउटलुक से साभार




हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

Friday, May 18, 2018

सुशील मानव की कविताएँ


सुशील मानव

सुशील मानव की कविताएँ बहुत धीमे और चुपचाप कथा कहती हुई-सी लगती हैं  और एक समय अपने गिरफ्त में ले लेती हैं। इस कवि से अनहद कोलकाता का पहला परिचय हो रहा है लेकिन कहना चाहिए कि यह कवि बार-बार अनहद पर पढ़ा और सराहा जाएगा। बहुत संक्षेप में कहने वाली बात यह है कि जिन कुछ कवियों में शिल्प का अतिरिक्त आग्रह न होते हुए भी अच्छी कविता लिखने की कुशलता है सुशील मानव उनमें प्रमुख होंगे। कहते सुना है कि बड़ी कविता अपने पेट में कथा और बड़ी कथा अपनी आत्मा में कविता छुपाए रखती है - इस कवि की कविता पढ़ते हुए यह एक पुरानी बात याद आ गई।
आप स्वयं निर्णय करें। आपकी बेवाक़ राय का इंतजार तो रहेगा ही।




बिहरनिया

एक ही रोज गाँव में तीन लोगों ने तीन खरीददारी की
रामप्रसाद मिसिर ने खरीदी हीरो-होंडा मोटरसाइकिल चालीस हजार में
रामजी यादव ने खरीदी मोर्रा भैंसकुल रुपए तीस हजार देकर
रामदीन पटेल ने खरीदी एक औरत चुकाकर पच्चीस हजार नगद
लोगों ने रामप्रसाद को मशविरा दिया कि सड़क पर सम्हाल कर चलाना मोटरसाइकिल
लोगों ने रामजी को समझाया कि ग़र भूसा-दाना चूनी-चोकर से नही टूटने पाई तो
तुम्हारे घर में दूध और पैसे की कमी न होने देगी भैंस
जबकि उन्हीं लोगों ने रामदीन को दी हिदायत
कि बहुत छुपाकर रखना अपने रुपए और जेवर
कि ज्यादा दिन टिकती नहीं है खरीदी हुई औरतें

यूँ तो वो गाँव में खरीद कर आई चौथी औरत थी
इत्तेफाक ऐसा कि सबकी सब बिहार की
इसीलिए पूर्व की औरतों की तरह उसका भी नाम बिहरनिया पड़ गया
रूप-रंग नाक-नक्श ऐसा कि उस साकोई नहीं था पटेल बस्ती में
यूँ कि पूरे गाँव में भी नहीं  
गाँव के सारे लड़के अब रामदीन के दुआरे मछेव लगाए रहते
खेत-खलिहान, ताल-तलई शौंच के सारे रास्ते रामदीन के दुआरे होकर जाने लगे
यूँ मर्दों के पेट का मरोड़ हो गई बिहरनिया कि
गाँव भर के मर्दों को हगहगी पकड़ ली
दिन में कई-कई बार लोटा-डब्बा लिए शौंच दौड़ते वे
और लौटानी रामदीन के बम्बा पर रगड़-रगड़करखूब देर तक धोते हाथ पाँव
बिहरनिया के खरीद-मूल्य के बरअक्श ब्याहता होने का दर्प
गाँव भर की स्त्रियों को इनफीरियरिटी काम्पलेक्स से उबारलेता
यूँ तो जन्मजात काना था रामदीन, पर दूजी आँख से भी कम ही फरियाता
दिन-बीते तो बिल्कुल भी न लौकता कुछ
इसी बात का ताना मार-मारकर बिहरनिया का कलेजा जराते लोग कि
इतनी सुंदर देह भर-रात नंगी होकर भी अनदेखी रह जाती होगी

दो तूर की फसल बेंच रामदीन ने बनवाई सात लड़ी की करधन
कमर पे हाथ धराई के बदले
जिसे पहनकर महीनों मटकती फिरी बिहरनिया
और सात सात तोले की घूँघुर लगी पायल
जो किसी गुफ्तचर की मानिंद बज-बजकर
पल-पल बिहरनिया का दर-पता बताते

एक रोज देहरी पर दीया बारती बिहरनिया से रामदीन ने कही अपने दिल की बात
मेरी अँधेर ज़िदग़ी में भी बार दो एक दीपक
बिना किसी लागलपेट के बताया बिहरनिया ने कि
नहीं बन सकती वो कभी किसी के बच्चे की माँ
कि धोखे से निकलवा दी है दलाल ने उसकी बच्चेदानी
और फिर कई दिन रोते रहे दोनों एक दूजे का अँधेरापन

गाँव के अधिकांश मर्दों की नीयत का एसिड टेस्ट ले चुके रूप के बूते
कुछ ही दिनों में लिटमस पेपर हो गई बिहरनिया
चाहे-अनचाहे महिलामंडली में शामिल होती तो हिदायत देती
दीदी-बहिनी फला-फला मर्द से बचाकर रखना अपनी बच्चियों को
कि कमीने ऐसी ऐसी बातें कह रहे थे मुझसे कि कहते घिन आती है

यूँ तो तीन साल बीत गए पर अविश्वास के पहर नहीं बीते
इस दर्म्यान वो सिर्फ दो बार गई अपने घर भागलपुर बिहार
बिस्तर पर जाते ही किसी गठरी की मानिंद खोलता वो बिहरनिया की देह
मन में एक खटका सा था कि
रात-बेरात बिहरनिया के बालों की पिन या ब्रा की हुक चुभती
तो चौंकन्ने रामदीन के कान खड़े हो जाते
कहीं कोई चाकू वाकू तो नहीं बिहरनिया के पास

हालाँकि कितने कान, कितनी आँखें थी बिहरनिया पर
पर कभी किसी ने नहीं किया दावा कि
कभी किसी गैरमर्द से कोई लपर-झपर या नैन-मटक्का रहा हो बिहरनिया का
तीन बरस बाद भी नहीं जमा भरोसा रामदीन का
तो उसके पाँव भी नहीं जमे रामदीन की देहरी
एक रोज बिना किसी से कहे-सुने कुछ
चली गई चुपचाप
देह के सारे जेवर उतारकर
तब ले दो बरस बीते
कभी-कभार गहनों की पोटली खोलता है रादीन
और उस करधन में धूँढ़ता है बिहरनिया की कमर
रात रामदीन के सपने में आती है बिहरनिया
और कहती है मोटी हो गई है मेरी कमर
अब नहीं समाएगी मेरी कमर, तुम्हारी करधन में रामदीन।


हर स्त्री स्त्री नहीं होती


खूब ठठाकर हँसे, आधा दर्जन लोग
कि उनकी नर्रा-फाड़ हँसी
टीवी-वाले कमरे से निकल
घुसी जा रही बरज़ोरी सेजनानाखाने में
माँ ने कनखियों से झांका
ब्लैक-एंड-व्हाइट डब्बे में दिख रहीं महिला राष्ट्रपति
किसी पुरुष की छाती पर राष्ट्रपति मेडल टाँकती हुई
बिल्कुल वैसी जैसी कभी कभी दिखती है माँ खुद
पिता की छाती में बटन टाँकते हुए
पृष्ठभूमि में गूँज रहा महिला उद्घोषिका का बुलंद स्वर
अदम्य साहस, पूरी निष्ठा,लगन व ईमानदारी से राष्ट्र की सेवा के लिए
अंकित गर्ग को राष्ट्रपति पदक से सम्मानित करते हुए
ये राष्ट्र, स्वयं को गौरवान्वित महसूस करता है
उफ्फ़! कितनी जोर से अपनी गदोरियाँ पीटी थी,ठकुराने के नागेंदर चाचा ने
और फिर पिता की ओर देखकर कहा था
इसे कहते हैं मर्दानग़ी
अफसर हो, तो ऐसा हो
पठ्ठे ने अकेलेदम छत्तीसगढ़ के नक्सलियों के पाँव उखाड़ दिए
और फिर एक गिलास पानी के बहाने मुझे कमरे से बाहर भगा
पिता के मुँह में मुँह डाले खूब चहचहाकर फुसफुसाए थे नागेंदर चाचा
पट्ठे ने महिला नक्सलियों के तो
अगवाड़े तिन-फुटा बेंत और पिछवाड़े बोल्डर भर दिए थे
अरे! फाड़कर रख दिया था उनका अगवाड़ा और पिछवाड़ा, सब
कान पारे खड़ी माँ, पीछे से सब सुन रही
पिता ने आवाज दी,बेटे
चाय बन गई हो तो, ले आओ
और हाँ, माँ से बोलो खाना आज यहीं खाएंगे सब लोग
माँ ने बलकती चाय उठाई और नाबदान में उड़ेल दी
छोटी पूँछ और कैप्सूल जैसे आकार वाले सफेद, लिजलिजे नाबदान के कीड़े
झुलसकर झन्न हो गए
माँ ने कहलवा भेजा, दूध में बिस्तुइया गिर गई है, पियो तो बना दें
चूल्हा पानी पीकर ठंडा पड़ गया
दोनों एक साथ नहीं जल सकते
आज से पहले कभी,
नहीं देखा माँ को, अपना दुःख भी अपनी तरह महसूसते
पर, आज!
आज तो माँ स्त्रीत्व का शोक मना रही हों जैसे
आज 26 जनवरी को भगवान भी ललाते रहे
माँ ने नहीं लगाया भोग
हाँ, मंदिर के भीतर शिवलिंग के ठीक ऊपर टँगी जलहरी को भले नोच फेंका
सीढ़ियों से लुढ़कती, खनकती, खटखटाती जलहरी भुंई जा गिरी
आवाज सुन पिता समेत सभी टीवी छोड़ बाहर आ खड़े हुए
सन्न और बदहवास
क्या हुआ? क्या हुआ?
माँ चिल्लाई, देखते नहीं
किसने लाकर टाँग दी है सोनी सोरी की योनि
मंदिर में?
कब से शिवलिंग पर टपक रहा है उसकी योनि का ख़ून!
देखो तो पूरा मंदिर खून से लाल-लाल हो गया !
अचानक ये माँ को क्या हो गया
सबके होश-ओ-हवाश ग़ुम

रात को पढ़ाने बैठी माँ ने
किताब में लिखे उस कथन के सामने क्रास का निशान लगवाया
जिसमें लिखा था
प्रतिभा पाटिल देश की प्रथम महिला राष्ट्रपति हैं
हर स्त्री, स्त्री नहीं होती, माँ ने कहा
पुरुष स्त्री की देह में भी होते हैं
हम बच्चों की जिद पर कारखाने से मिले जिस झंडे को
घर के खपरैले पर पिता ने मूँछों को ऐंठकर फहराया था
उसका डंडा चूल्हे में जलाकर
माँ ने गरमाया हम बच्चों के लिए रात का दूध
अगली सुबह दरवाजे के कुंडे में पेटीकोट के नाड़े से झूलता
माहवारी के कत्थई ख़ून में लथपथ
तिरंगा, शोकग्रस्त था !!!

कई बार

कई बार
ज़रूरी होता है
सैनिकों का मरना
प्रतिरोध तोड़ने के लिए
कई बार
कई बार सरकार ही हो जाया करती है मुखबिर
और भेजवा देती है सूचना नक्सलियों के पास
कि, कहां से,
कब और कैसे गुजरेगा जवानों का जत्था, कई बार
कई बार बेहद आसान होता है
आदिवासी को नक्सली बताकर मार डालना
पर जब कभी आदिवासियों के प्रति भी
हमदर्दी पालने लगता है सभ्य समाज
तो कई बार बेहद जरूरी हो जाता है सभ्य समाज के वहम को तोड़ना
खतरा बन जाती है कई बार सरकार के लिए
किन्हीं दो समाजों, दो समुदायों के बीच एकता, एकजुटता
कई बार केचुए सा काँटे में फँसाकर
जंगल के पानी में फेंक देती है सरकार
सेना को, मछली के इंतजार में
कई बार मछली फँसाई और काटी, खायी जाती है इसी केचुए (सेना) के जरिये
कई बार हमारी सहानुभूति केचुए के लिए पैदा की जाती है
और हमें लगता है कि अब केंचुआ खा जाने के बाद
जायज है मछली का सरकारी फंदे में फँसना
कटना और मरना
बचपने में अक्सर गाँव के ठाकुर चवन्नी का लालच दे
लड़वा देते हम दो भाईयों को
और हम दोनों माटी में लोटम-पोट होते
पटका-पटकी में बाल नोचते-निछियाते ऊपर-नीचे होते
कहीं काँकड़ धँसता, कहीं नाखून तो कहीं दाँत
नोचा-नोची में खूनम-खून हो रोते-चिल्लाते एक दूसरे की माँ बहिन गरियाते घर आते
तो माँ दोनों सेपूछती बारी बारी से
तेरी माँ कौन है? और तेरी कौन?
क्या तुम दोनों की माँ बँटी है ?
या कि अलग अलग है ?
हमारी अक्ल का पर्दा हटा माँ समझाती
अब से ठाकुर के दुआरे नहीं जाना
न ही ठाकुर के कहने पर एक दूसरे से मुड़फुटौव्वल करना
कुछ उसी तर्ज पर बनाई थी सरकार ने सलवा जुडूम
कमाल की सरकारी योजना थी भाई
सलवा जुडूम
हम आदिवासी भाइयों के मरने-मारने की फुल- प्रूफ सरकारी व्यवस्था
इतिहास में पहली बार
पहली बार किसी सरकार ने खुले तौर पर थमाया हथियार
अपने नागरिकों को रोटी की जगह
भाइयों नें बचपन में मिली माँ की सीख बिसरा दी
ठाकुर ने दोनों भाइयों को बंदूक थमा दिये
और छत्तीसगढ़ के जंगल लाल- लाल हो उठे
एक दूसरे के सीने में, भाइयों ने
प्यार की जगह भर दिये बारूद
पर जो समझदार थे वो नहीं लड़े
जिन्हें माँ के सिखाए सबक याद थे
वो नहीं लड़े
पर जो गाँव में नहीं लड़ते
वो चंबल के बीहड़ों और सुकमा के जंगलों में लड़ते हैं
यूँ कि लड़ने की हद तक मजबूर कर दिये जाते हैं
जो पैसों के लिए नहीं लड़ते वो कुचले हुए आत्मसम्मान के लिए लड़ते हैं
ठाकुर जानता था
तभी तो जो भाई नहीं लड़ते थे
उनकी बहनों से वो खुद लड़ता था
रात के जंगल में
बिस्तर के अखाड़े में
जब भाई गाँव- गेंवार गुहार लगाता
तो ठाकुर पूरे गाँव के सामने गर्व से कहता इसकी बहन रंडी है
सरकार कहती है मेरी बहन नक्सली है
और फिर तो जैसे वो
सेना को मेरी बहन का बलात्कार करने का लाइसेंस सा दे देते हैं वो!!
उन्हें पता है मेरी बहन, मेरी बेटी, मेरी साथी का बलात्कार हो जाने के बाद
मैं हाथ में हथियार लिए आऊँगा अपना बदला लेने
और वो मेरे इंतजार में बैठे रहेंगे
रास्ते में घात लगाये ।
कई बार
बेहद ज़रूरी हो जाता है बलात्कार
मेरी हत्या की तरह
मेरी हत्या के लिए

कहो, ओ मरचिरइया कहो

चाँद की लौ पे, औंधी
काजर पारती रात
दुआरसँटे बाग़ में, रोती है मरचिरैया
सामने खड़ा, डरा-सहमा बचपन मेरा
कभी प्यास, कभी पेशाब, कभी उमस
कभी खुजली मचाती घमौरियों के चलते, अक्सर
आधी रात, फुर्र हो जाया करती नींद पलकों केपिंजड़े से
एक अजीब सी आवाज़ कानों से पानी काढ़ती
ये इत्ती रात गए भला कौन बोल रहा अम्मा
मुझे और-कसते हुए अपनी छाती से, अम्मा कहतीं
मरचिरइया रांड़ी अपशकुन रो रही
हजार पूछने पे बस इतना कहतीं अम्मा
कि उस पर कान न धरो तुम, सो जाओ, एकदम सनामन होके
तब लोग-बाग मुझे बताते या कि डराते
मर जाता है वो, धर देता है कान जो मरचिरइया की रोवाई पे
और तब से हमेशा डरता रहा मैं, ओ मरचिरइया, तुम्हारी रोउनई की हदस से
कभी आधी रात उचट जाती नींद तो मारे डर के कानों में उँगलिया घुसेड़ लेता मैं
कि कहीं से भी न आए मेरे कानों तक, तुम्हारी रोउनाहट
और लंबी-लंबी साँसे लेता-छोड़ता कंचे सा चित्त से नींद पर निशाना साधता
बाद में जब असमर्थ हुए बाबा चलने-फिरने से
तब अक्सर उनकी आवाज़ पर मन-बे-मन उठता
कभी यूरिन-पाट्स लगाने तो कभी गला तर कराने
खटिया पे खाँसती अम्मा के शब्द कान के कुंए में डुबकी मारते
ई राड़ी मरचिरइया जाने केकर जिउ लइके मानी
उन दिनों रात-रातभर तारों से बतियाते बाबा
मैं डरता, कि वे सुनते तो होंगे मरचिरैया की रोवाई
और उनके बिछोह की कल्पना भर से काँप उठता मैं
और फिर होते सुबह सोते बाबा की नाक पर फिरा-फिराकर उंगुलियाँ
उनकी सांसों का राह-टेह लेता मैं
बाबा के फूलते-पिचकते पेट उनकी सलामती का सिगनल देते
मनोभ्रम जियाये रखने के निमित्त दिमाग तर्क करता
कि आजकल ऊँचा सुनने लगे हैं बाबा
मुमकिन है मरचिरइया की रोवाई पहुँचती ही न हो, उनके कानों तक

मिहिर-सत्ता-दमन से छुपकर
रहती तुम बखरी के पिछवाड़े की दर्राई चियारों में
डरे हुए लोगों ने भरे पिता के कान, कि तुम्हारा हमारे इर्द-गिर्द होना अपशकुन है
कि वे उजड़वा कर तुम्हारी रहनवाई, मुँदवा दें दर्रे-ए-चियार
आओ, उतर आओ ओ मरचिरैया व्यथा की डालियों से
कि आज अपने मरने के मूल्य पे भी
सुनना चाहता हूँ मैं तुम्हारी वेदना का मर्म
तुम्हारे रोने की वजह
बताओ तो मुझे, ओ मरचिरैया किसने बना दिया तुम्हारी आँखों को सदानीरा
तुम्हारी वेदना को सुननेवाले का अभिशाप बताकर
कहो ओ मरचिरइया, क्यों रोती हो तुम रोज-ब-रोज आधी रात में
मैं सुनना चाहता हूँ ओ मरचिरइया, तुम्हारे अनसुने आँसुओं की दास्तान
सदियों का तुम्हारा संताप
मत रोवो, ओ मरचिरइया
मत रोवो
क्या तुम्हारे राजा ने भी कर दिया है जलमग्न, तुम्हारा जीवन
बढ़ाकर बाँध की ऊँचाई तुम्हारे जीवन की नर्मदा पर?
तुम्हारे यहाँ भी भुखमरी मची है क्या, अपशकुन बताकर काट दिए गए गूलर-पेड़ों के बरअक्श!
या कि कर्ज से आजिज़ आ खुदखुशी किए साथियों का हक़ माँगने गए
तुम्हारे खसम पर भीराजा ने दगवा दिए हैं गोलियाँक्या
अँधेरी रातों में भरा-पूरा यौवन लिए क्या तुम अपना रँड़ापा रोती हो?
कहो, ओ मरचिरइया कहो
जो नहीं कह पाई तुम, आज तलक़ किसी से
क्या किसी दंगे में फूँक-ताप दिए गये तुम्हारे घर-परिवार, हित-नात?
क्या तुम्हारे भी बच्चों के हिस्से के इलाज के पैसे
खर्च हो गए विधायकों की खरीदारी में ?
कहो तो मरचिरइया क्यों रोती हो तुम
किसी भी कीमत पर आज सुनकर ही मानूँगा मैं
तुम्हारी रोउनई की कविता
तुम्हारी वेदना की कहानी
तुम्हारी आँसुओं का उद्गम
तुम्हारी पीड़ा का उत्स
किसके बाबस्ता तुम रात-ओ-रात विलापती आई
कहो, ओ मरचिरइया कहो
****


सुशील मानव
जन्मतिथि- अगस्त 1983

शिक्षा-हिंदी साहित्य,समाजशास्त्र और जैव-रसायन से परास्नातक

पेशा- स्वतंत्र पत्रकार (हाल-फिलहाल बेरोजगार)



समाजिक सराकारों में रुचि, विशेषकर मजदूर वर्ग के लिए कई वर्षों से कार्यरत हूँ।

कविताएं एवं कहानियाँ कई पत्रिकाओं में प्रकाशित। फिलहाल कोई साहित्यिक-संग्रह प्रकाशित नहीं ।

पोस्टल एड्रेस सुशील मानव c/o डी एन पांडेय

गाँव-पाली, पोस्ट-बाबूगंज, तहसील-फूलपुर, जिला-इलाहाबाद, उ.प्र., पिनकोड-212404



ईमेल-susheel.manav@gmail.com

मोबाइल- 06393491351
 



हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad