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Tuesday, September 19, 2017

मनोज कुमार पांडेय की नई कहानी "जेबकतरे का बयान"



मनोज कुमार पांडेय

मेरे लिए वे कथाकार बाद में हैं – दोस्त पहले हैं। 2004 में दोस्ती तब शुरू हुई थी जब मेरी कहानी पढ़कर फोन किया। तब से कई मुलाकाते हैं और कई बाते हैं। लेकिन गौरतलब बात यह है कि इस बीच बंदे ने खूब उम्दा कहानियाँ लिखीं और चर्चित भी हुए। मुझसे एक कहानी का भी वादा था, जो आज एक बहुत उम्दा कहानी के साथ पूरा हो रहा है – और वादे और करार हैं वे भी पूरे होंगे। यह दोस्ती तो उम्र भर की है।

जेबकतरे का बयान
मनोज कुमार पांडेय

आप बहुत अच्छे आदमी हैं। अभी आपकी एक आवाज पर मेरा कचूमर निकल गया होता पर आपने बस मेरा हाथ पकड़े रखा। मैं शर्त लगाकर कह सकता हूँ कि आप या तो लेखक हैं या पत्रकार। नहीं भी हैं तो आपके भीतर एक कलाकार का दिल धड़कता है। नहीं तो बताइए कि मैं आपका पर्स मारनेवाला था और आप मुझे यहाँ मेरी पसंदीदा जगह पर बैठाकर बीयर पिला रहे हैं। आपने एक थप्पड़ तक नहीं मारा मुझे। कैसे आदमी हैं आप? आजकल इतना भला आदमी होना भी ठीक नहीं।
वैसे आपने बहुत अच्छा किया जो वहाँ पर शोर नहीं मचाया। मैं भीड़ की तलाश में ही दिल्ली आया था। भीड़ बचाती भी है और भीड़ मार भी देती है। पूरे दो बार भीड़ बस मेरी जान ही ले लेने वाली थी। पहली बार इलाहाबाद में लक्ष्मी टाकीज में पर्स उड़ाते हुए पकड़ा गया। इतनी मार पड़ी कि महीनों उठने का होश नहीं रहा। पर इसी के साथ मेरा डर भी खतम हो गया। हमेशा के लिए। शुरू में बस एक दो मिनट तक दर्द हुआ, हालाँकि यह दर्द इतना भीषण था कि आज भी उसे याद करके काँप जाता हूँ। पर बाद में मैं किसी भी तरह के दर्द के एहसास से मुक्त हो गया। जब मुझे लोग लात घूँसों से मार रहे थे, मेरी हड्डियाँ तोड़ रहे थे तो मैं उन्हें उन्हीं नजरों से देख रहा था जिन नजरों से वहाँ मौजूद तमाशाई इस सब को देख रहे थे। बाद में तो खैर मुझे इसका भी होश नहीं रहा।
वह तो कहिए पुलिस आ गई नहीं तो आपको यह कहानी कोई और ही बैठकर सुना रहा होता। भीड़ का जवाब भीड़ ही होती है। वहाँ इलाहाबाद में इतनी भीड़ नहीं थी। भीड़ की तलाश में मैं मुंबई चला गया। मुंबई लोकल, जिसके बारे में मुंबई का एक अखबार पहले ही पन्ने पर एक कोना छापता है, कातिल लोकल के नाम से। जिसमें छपता है सात मरे, सत्रह घायल। उसी लोकल में मेरा कारोबार चल निकला पर जल्दी ही मेरे मौसेरे भाइयों ने मुझे पकड़ लिया और बहुत मारा। पिटना मेरे लिए कोई नई बात नहीं थी पर यह बात मुझे बहुत बुरी लगी कि वे मारते हुए मराठी में गालियाँ दे रहे थे। मुझे किसी ऐसी भाषा में गाली खाना बहुत बुरा लग रहा था जो मैं नहीं समझता था। मुझे पता होना चाहिए था कि मुझे कौन कौन सी गालियाँ दी जा रही हैं जिससे कि कभी मौका मिलने पर मैं उन्हें सूद समेत वापस कर सकता।
जब आप मेरे धंधे में होते हैं तो आपको हमेशा मौके की तलाश में रहना पड़ता है। और तब पता चलता है कि मौकों की कोई कमी नहीं है। हर कोई आपको मौका देना चाहता है। लोग बहुत दयालु हैं। वे नहीं चाहते कि आप भूखे रहें या कि दिन भर में आपको बीयर की एक बोतल तक नसीब न हो। जैसे अभी एक दिन सुबह से खाली हाथ भटक रहा था कि राजीव चौक में विज्ञापन के लिए लगाई गई एक स्क्रीन पर ब्ल्यू फिल्म चलने लगी। अब बताइए ब्ल्यू फिल्म आजकल कोई ऐसी चीज है जिसे यूँ देखा जाय पर लोग इस तरह से डूब कर देखने लगे कि जैसे जीवन में पहली बार देख रहे हों। कई तो वीडियो बना रहे थे। मैंने डेढ़ मिनट के अंदर दो लोगों की पर्स उड़ा ली।
इस धंधे में धैर्य सबसे जरूरी चीज है। जरा सी भी जल्दबाजी जानलेवा हो सकती है। मुझे भी यह बात धीरे धीरे ही समझ में आई। जब मैं इलाहाबाद से मुंबई के रास्ते दिल्ली आया तो दूसरी जो चीज मुझे साधनी पड़ी वह धैर्य ही थी। पहली चीज थी दिल्ली की मैट्रो। शुरुआत में मैट्रो मुझे किसी दूसरी ही दुनिया की चीज लगती थी। मैट्रो स्टेशन पर ऊँची ऊँची बिजली से चलने वाली सीढ़ियाँ मुझे डरा देतीं। बहुत पहले मैंने किसी अखबार में पढ़ रखा था कि दिल्ली एयरपोर्ट पर एक छोटी सी लड़की इन सीढ़ियों में फँसकर चटनी बन गई थी। मैं इन सीढ़ियों में अक्सर खुद को फँसा हुआ देखता और मेरे शरीर में एक सिहरन सी दौड़ जाती। कँपकँपी होती। ऊपर से मुंबई और दिल्ली की भीड़ में भी बड़ा अंतर था। मुंबई में लोग जब भाग रहे होते तो लगता कि वह किसी का पीछा कर रहे हैं जबकि दिल्ली की भीड़ इस तरह भागती दिखाई देती जैसे उसका कोई पीछा कर रहा हो। खुशी की बात यह है कि मेरे लिए दोनों ही स्थितियाँ शानदार थीं। दोनों ही स्थितियों में मेरे जैसों पर कोई नजर भी नहीं डालता था।
     मैं आपकी बात बात नहीं कर रहा हूँ। पर सच यही है कि मेरे जैसों पर कभी कोई ध्यान नहीं देता। आपको पता है, मैंने पीएचडी कर रखी है! कई प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल होते होते रह गया। फिर करीब पंद्रह लाख रुपये उधार लेकर दरोगा बनने के लिए रिश्वत दी। रिजल्ट आता उसके पहले ही मामला कोर्ट चला गया। बीच में दो सरकारें आईं और गईं। अभी पता चला है कि फिर से परीक्षा ली जाएगी। मेरे पास इतना समय नहीं था। मैं उन लोगों से मुँह छुपाते हुए भाग रहा था जिनसे मैंने उधार लिया हुआ था। भागते भागते पहले मुंबई पहुँचा और फिर एक दिन दिल्ली आ गया। दिल्ली में मेरा एक दोस्त था जो एक राष्ट्रीय अखबार में मुख्य संवाददाता था और ऑफिस में बैठकर प्लास्टिक पीटा करता था। अभी थोड़ी देर में वह भी आ रहा होगा। बीयर पीने और मिलने बैठने के लिए यह जगह हम दोनों की फेवरेट है।
     वह न होता तो मैट्रो मुझे और डराती। जब स्वचालित सीढ़ियों पर पाँव रखने में मैं हकबका रहा होता वह हाथ पकड़कर ऊपर खींच लेता। धीरे धीरे मुझे भी मजा आने लगा। बिना मेहनत किए ऊपर पहुँच जाना भला किसे नहीं अच्छा लगता। फिर तो लाइफ इन ए मैट्रो शुरू हो गई। भीतर तरह तरह के लोग थे। पूरी दुनिया को ठेंगे पर रखते हुए एक दूसरे में डूबे लड़के-लड़कियाँ, मैं उनमें अक्सर अपनी इच्छाओं को जी रहा होता। बुरे से बुरे समय में भी मैंने उन पर हाथ साफ करने की कोशिश कभी नहीं की। बल्कि कई बार तो मैं उन्हें छुप-छुपकर इतने लाड़ से देख रहा होता कि अपने असली काम पर से मेरा ध्यान ही हट जाता। पर धीरे धीरे मैंने खुद पर काबू पा लिया, शो मस्ट गो आन। तब जो दुनिया मेरे सामने खुली वह मुझे कई बार अभी भी अचंभित करती है। 
     मैट्रो में ज्यादातर लोगों को एक दूसरे से कोई मतलब नहीं था। हालाँकि वे एक दूसरे को देखकर मुस्कराते, आँखों में पहचान का एक हल्का सा इशारा उभरता और गुम हो जाता। इसके बाद तो कानों में ठुँसा हुआ स्पीकर था। तरह तरह का गीत-संगीत था, डांस था, शार्ट फिल्में थीं, कामेडी वीडियो थे, बाबाओं के प्रवचन थे, यू ट्यूब पर चलने वाले धारावाहिक थे और भी न जाने क्या क्या था। मैट्रो में घुसते ही लोग मैट्रो को भूल जाते थे और स्मार्टफोन में घुस जाते थे। मुझे बहुत दिनों तक इस बात पर भी अचरज होता रहा कि इसके बावजूद लोग उसी स्टेशन पर उतर पाते हैं जिन पर उन्हें उतरना होता है। जो लोग स्मार्ट फोन से बचे थे वे अमूमन अंग्रेजी की सस्ती किस्म की किताबें पढ़ते दिखाई देते। यह एक साथ अपने अंग्रेजी जानने का प्रदर्शन और सुधारने की कोशिश थी। चेतन भगत ऐसे लोगों का शेक्सपीयर था।
     पर यह तो कमउम्र या कि युवाओं की बात थी। अधेड़ कई बार राजनीतिक चर्चाएँ कर रहे होते। एक राजनीतिक दल के सदस्य यात्रियों के रूप में मैट्रो में चढ़ते और जल्दी ही पूरे कोच को राजनीतिक अखाड़े में बदल देना चाहते। डिब्बे का तापमान बढ़ जाता। मेरे लिए ऐसी स्थिति हमेशा काम की होती जब लोगों के सिर गर्म होते। वे भी शिकारी थे, मैं भी। वे अनजाने ही मेरे संभावित शिकारों का ध्यान राजनीतिक और धार्मिक स्थितियों पर ले जाते और लोग जूझने लगते। जब मैं अपना शिकार चुन रहा होता तो तो पाता कि कई और दूसरे भी शिकार में लगे होते। कई अधेड़ इस तरह से मोबाइल में आँखें गड़ाए होते जैसे वह किसी बहुत गंभीर चीज में मुब्तिला हैं और उनकी स्क्रीन पर सामनेवाली लड़की की छातियाँ या टाँगें दिख रही होतीं। कई हाथों में माला फेर रहे होते और उनकी लोलुप निगाहें उन किशोर-किशोरियों पर फिसल रही होतीं जो पूरी दुनिया को भूलकर एक दूसरे में डूबे होते। इस सब के बीच कभी कभी दिखने वाले वे लोग बहुत ही पवित्र लगते जो प्रेमचंद, शरत या दोस्तोएव्स्की पढ़ रहे होते। मैं मौका पाकर भी उन्हें छोड़ देता।
     दिल्ली मैट्रो का पूरा भूगोल समझ लेने के बाद मैंने राजीव चौक, कश्मीरी गेट, मंडी हाउस या इंद्रलोक जैसे एक्सचेंज स्टेशनों पर अपना ध्यान केंद्रित किया। इसके बाद इफ्को चौक, नोएडा सिटी सेंटर जैसी जगहें थीं। वे सारी जगहें मेरे काम की थीं जहाँ भीड़ थी और लोगों का ध्यान अपने से ज्यादा गाड़ी पकड़ने पर था। इसके बाद इसमें कोई अचरज की बात नहीं थी कि उनमें से किसी का पर्स मेरी जेब में पहुँच जाता। लोगों को तुरंत पता ही न चलता। कई बार पता चल भी जाता तो लोग इस तरह से ठसाठस भरे होते कि उसकी समझ में न आता कि वह किस पर शक करे। सबसे बुरी बात यह होती कि वे शक भी करते तो उन पर जो गरीब दिखते। मैं तो आप देख ही रहे हैं कि किस तरह से टिपटाप रहता हूँ। लोग धोखा खा जाते हैं। असल बात यह है कि वे धोखा खाते रहना चाहते हैं। वे खुद को बदलना नहीं चाहते।
     इसके बावजूद कभी लगे कि शक मुझ पर भी जा सकता है तो सामने वाला अपना शक जाहिर करे उसके पहले ही मैं भी खुद को शिकार घोषित कर देता हूँ। सामने वाले ने जैसे ही कहा कि अरे मेरा पर्स कि पाँच सेकेंड बाद मैं भी चिल्ला पड़ता हूँ अरे मेरी घड़ी...। जबकि मैं घड़ी कभी पहनता ही नहीं। टाइम देखने का काम मोबाइल से चल जाता है। वैसे भी मेरे धंधे में टाइम का कोई वांदा नहीं। असली बात है धैर्य। बार बार टाइम देखने वाला तो शर्तिया पकड़ा ही जाएगा। पर कई बार मेरे जैसे लोग भी पकड़ ही लिए जाते हैं। आखिर आज आपने पकड़ ही लिया। यह अलग बात है कि आप बहुत ही शरीफ व्यक्ति हैं और मुझे बैठाकर बीयर पिला रहे हैं।
     जानते हैं जैसे लोग तरह तरह के होते हैं वैसे ही उनकी पर्स भी। कामयाबी से हाथ साफ करने के बाद अगला काम पर्स को ठिकाने लगाना होता है। रुपये के अलावा उनमें तरह तरह के कार्ड्स, परिचय पत्र, तसवीरें, पते, फोन नंबर, कंडोम, आई पिल्स या अनवांटेड-72 जैसी गोलियाँ, शाम को घर ले जानेवाले सामानों की लिस्ट और कई बार चिट्ठियाँ भी। तमाम लोग अपनी अपनी आस्था के हिसाब से देवी-देवताओं की तसवीरें, तांत्रिक त्रिभुज या शुभ चिह्न रखते। तरह तरह के फूल, अभिमंत्रित धागे, कचनार या कि समी की पत्तियाँ। यह अलग बात है कि इसके बावजूद उनका पर्स मेरे हाथ में होता और मैं इन सबको निकाल बाहर करता। पर एक ऐसी चीज है जिसे मैं कभी नहीं फेंक पाता। तसवीरें फेंकते हुए मेरे हाथ काँपने लगते हैं।
     आपको भरोसा नहीं होगा पर मेरे कमरे पर कई फाइलें उड़ाई गई पर्सों से प्राप्त तसवीरों से भरी पड़ी हैं। मुझे अपने कारनामों का हिसाब रखने का कोई शौक नहीं पर तसवीरें पता नहीं क्यों मैं नहीं फेंक पाता। नहीं मैं ईश्वर या देवी-देवताओं वाली तसवीरों की बात नहीं कर रहा हूँ। मैं तो उन तसवीरों की बात कर रहा हूँ जो मेरे द्वारा शिकार किए गए व्यक्तियों के प्रिय व्यक्तियों की होती है। बच्चे, पत्नी, प्रेमिका, किसी दोस्त या फिर माँ या बाप की तसवीर। मैं उन तसवीरों पर वह तारीख और जगह लिखता हूँ जहाँ से वे मेरे पास आईं। खाली समय में मैं अक्सर उन तसवीरों को निहारते हुए पूरा पूरा दिन बिता देता हूँ। काश कि वह तसवीरें मैं कभी उन्हें वापस कर पाता जिन्होंने उन्हें सँजोकर रखा हुआ था। मैं भी उन्हें उतने ही प्यार से अपने पास रखना चाहता हूँ।
कई बार मैं उन तसवीरों में गुम होकर उदास हो जाता हूँ। कौन हैं वे लोग? उनका उस व्यक्ति से क्या रिश्ता रहा होगा जिनका मैंने शिकार किया। तब मेरे भीतर एक बहुत ही बेसब्र इच्छा जोर मारती है कि मैं कभी उन लोगों से मिल पाऊँ। उनसे अपने किए की माफी माँगूँ कि मैंने उन्हें उस व्यक्ति से दूर कर दिया जो उन्हें इस तरह से अपने कलेजे से लगाकर रखता था। यह सब सोचते हुए कई बार मेरी आँखों में आँसू आ जाते हैं। कमाल की बात यह है कि शुरुआती दिनों के अलावा मैंने अपने शिकारों के बारे में कभी नहीं सोचा। यह साधने में थोड़ा वक्त जरूर लगा मुझे पर यह मैंने कर लिया। आप पढ़े-लिखे व्यक्ति लग रहे हैं। आपको देखकर ही पता चल जाता है कि आपके भीतर एक कलाकार छुपा हुआ है। आप बताएँगे कि वह तसवीरें आज तक मैं फेंक क्यों नहीं पाया?
अरे नहीं, उन लोगों का उधार मैंने अभी तक नहीं चुकाया है। आप सोचेंगे कि अब तो मेरे पास बहुत सारे पैसे होंगे, चुका क्यों नहीं देता पर यह सच नहीं है। मेरे पास कई बार अगले दिन की चाय का भी पैसा नहीं होता। जो कमाता हूँ सब खर्च हो जाता है। आजकल वैसे भी लोग पर्स में भला कितने पैसे रखते हैं? और कभी हो भी गए तो भला क्यों चुकाने जाऊँगा। आप उन लोगों को नहीं जानते। वे मेरे ऊपर इतना ब्याज लाद देंगे कि उसे चुकाने के लिए मुझे डकैती ही डालनी पड़ेगी। यहाँ सब कुछ शांति से चल रहा है। मैं चाहता हूँ कि सब कुछ इसी तरह से चलता रहे। आज तो आप भी मिल गए और इतने इत्मीनान से बैठकर मेरे साथ बात भी कर रहे हैं। मैं बता नहीं सकता कि मैं अपने धंधे से कितना खुश हूँ। यह न होता तो भला आप आज कैसे मिलते।
देखिए मैंने आपको अपनी पूरी आपबीती सुनाई। आप पुलिस नहीं है अच्छे आदमी हैं। कलाकार हैं। पुलिस होती तो मैं दूसरी कहानी सुनाता। एक बार तो मैंने पुलिस को भी ऐसी कहानी सुनाई थी कि दो पुलिसवाले थे और दोनों ही इमोशनल हो गए। कहानियाँ अभी भी असर करती है बस उन्हें नई और अनोखी और अविश्वसनीय होना चाहिए। लोग अविश्वसनीय कहानियों पर ही सबसे ज्यादा भरोसा करते हैं। खैर छोड़िए आज का पूरा समय तो आप को अपनी रामकहानी सुनाने में बीत गया। यह पहली बार है कि मैंने किसी पर्स को हाथ लगाया और वह अब भी वहीं मौजूद है जहाँ उसे नहीं होना चाहिए था। कम से कम एक बोतल बीयर तो और पिलाते जाइए। शरीफ कहे जाने वाले लोग तो हर मोड़ पर चार टकराएँगे। आपने कभी किसी जेबकतरे के साथ बैठकर बीयर पिया है? आप पैसे खर्च करें तो मैं थोड़ी और देर तक आपको यह मौका देने के लिए तैयार हूँ।
    
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मनोज कुमार पांडेय - 8275409685




हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

Tuesday, September 5, 2017

युवतर कथाकर शहादत की नई कहानी




आशिक़-ए-रसूल
शहादत
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          ये लोग जो एक छोटी सी बात का बतंगड़ बनाकर अपनी धार्मिक भावनाओं के आहत होने की शिकायत कर रहे है ना, सच पूछो तो इन्हें धर्म का रत्ती भर भी मतलब पता नहीं है, यह मेरे अब्बू ने कहा था। उन दिनों इलाके की एक मस्जिद में एक पॉलोथीन में कुछ खूनी कपड़े, सिर के बाल और गोश्त के टुकड़े बंद पड़े मिले थे। इससे गुस्साए लोगों ने पूरे इलाके में इतना उत्पात मचाया था कि प्रशासन को शांति कायम करने के लिए कर्फ्यू लगाना पड़ा था। जवानी के दिनों में अब्बू जी बड़े धार्मिक थे। पांचों वक्त की नमाज़ पढ़ते थे। खाली वक्त में भी वे मस्जिद में बैठे रहते और कुरान-ओ-हदीस की तिलावत (पढ़ाई) करते रहते थे। लेकिन बुढ़ापे में पहुंचने पर उनका धर्म से मोहभंग हो गया और उन्होंने एक दिन घोषणा करते हुए कहा- मैं आज के बाद कभी नमाज़ नहीं पढूंगा... और न ही कुरान को हाथ लगाऊंगा।
उस दिन के बाद वे सारा दिन बैठक में बैठे रहते और खुद से बुदबुदाते रहते। मोहल्ले की मस्जिद में जब यह हादसा हुआ था तो उन्होंने कहा था- सब के सब हरामी है साले। मूर्ख और जाहिल। इतनी सी बात पर इन्हें इतना उत्पात मचाने की क्या ज़रूरत है? किसी ने अगर मस्जिद में कुछ गंदी चीज़ फेंक दी है तो तुम साफ कर दो। बस, बात खत्म। लेकिन नहीं...! ये लाठी-डंडे लेकर सड़कों पर उतारेंगे... ट्रैफिक जाम करेंगे... बाजारों को बंद कराएंगे... एक-दूसरे के ऊपर पत्थर फेंके... आपस में झगड़ा करेंगे... आग लाएंगे... पूरी जमी-जमाई एक व्यवस्था को पल भर में तहस-नहस कर देंगे। और ये सब काम कौन करेगा? जिनका धर्म से कुछ भी लेना देना नहीं हैं। तुम जो इन उत्पाती लड़कों को देख रहे हो ना जो धर्म की रक्षा के नाम पर आज सीना तान के मरने-मारने के लिए खड़े है इनमें से तुम एक को भी मस्जिद में नहीं देख पाओगे। एक समय का नमाज़ में भी नहीं। अरे, नमाज़ तो छोड़ो ये लोग जुमा भी पढ़ने नहीं आते। सारा दिन ये लोग शराब और जुओं के अड्डों पर मारे-मारे फिरते हैं। और अगर इनमें से कोई भूला-भटका जुमे के दिन मस्जिद तक आ भी गया तो क्या? हफ्ता में एक बार नमाज़ पढ़ लेने से कोई मोमिन नहीं हो जाता! लेकिन ये अब सबसे पक्के और सच्चे मुसलमान बनकर आए हैं। असली मोमिन। इस्लाम को बचाने... उसके रक्षक! जाहिल कहीं के।
क्या इस्लाम में ये लिखा है कि तुम रोजे-नमाज़ छोड़कर एक जरा-सी बात पर इस तरह उत्पात मचाओ। दूसरों को तंग करो। अव्यवस्था फैलाओ। पड़ोसियों को तकलीफ़ दो और शराब पियो और जुआ खेलो। ये खुद को आशिक़-ए-रसूल कहते हैं... जिन्हें रसूल की शफक्कत, मौहब्बत और रहम-दिली का ज़र्रा बराबर भी इल्म नहीं है। समझ नहीं आता कि ये कैसे खुद को उस नबी का आशिक़ कह सकते हैं जिसने कभी किसी का बुरा चहाना तो दूर किसी के बारे में बुरा सोचा तक भी नहीं। अपने दुश्मनों के लिए भी उन्होंने बद्दुआ नहीं की। उनके लिए भी नहीं जो हर वक्त उन्हें मारने-करने की ताक़ में रहते थे। वह नबीं जिसने कभी उस बुढ़ी औरत को कुछ नहीं कहा जो राह-गुजरते हर रोज़ उनके ऊपर कुड़ा फेंका करती थी। और फिर जब कई दिनों तो उसने उन पर कुड़ा नहीं फेंका तो क्या वे खुश हुए? नहीं। बल्कि उन्हें उसकी फिक्र हुई। उन्होंने उसके पड़ोसियों से पूछा। जब उन्हें पता चला कि वह बीमार है तो वह उसकी अयादत के लिए गए।
ये खुद को उस नबी का आशिक़ कहते हैं जिसने मस्जिद में पेशाब करते एक आदमी को देखकर भी उसे उस वक्त कुछ नहीं कहा। हालांकि उस वक्त हजरत उमर (रजि.) जैसे सहाबा उनके पास बैठे थे, जो उस आदमी की इस गलीज़ हरकत को देखकर इतने गुस्से से भर गए थे कि उस आदमी का अपने तलवार के एक ही वार से सिर धड़ से अलग कर सकते थे। और वह ऐसा करने के लिए चल भी पड़े थे। लेकिन नबी ने उन्हें रोक लिया। फिर जब वह आदमी पेशाब कर चुका तो वह खुद उसके पास गए और कितनी मौहब्बत से उससे कहा- मेरे भाई, मस्जिद अल्लाह का घर है... यहां पेशाब नहीं किया करते। वह आदमी नबी की इस बात से इतना मुत्तासिर हुआ था कि उसने मय अपने पूरे कबीले के इस्लाम कबूल कर लिया था। लेकिन आज इन आशिक-ए-रसूलों को देखो... इन्हें देखकर लगता है कहीं से कि ये उस रसूल के उम्मती हैं। साले उत्पाती।
अरे! मस्जिद तो अल्लाह का घर है... अगर कोई उसमें गंदगी फैलाता है या उसकी बेअदबी करता है तो वह खुद उससे बदला लेगा। तुम कौन होते हो किसी के घर की जिम्मेदारी लेने वाले। वह भी उसके घर की जिसने पूरे दुनिया की जिम्मेदारी उठा रखी है। इसका मतलब तो यह हुआ कि तुम्हें खुदा और उसकी कुदरत पर यकीन ही नहीं है। तभी तो तुम खुद ही लाठी-डंडे लेकर निकल पड़े हो। जानवरों की तरह। अरे कुछ उस नबी से तो सीखो जिसके तुम उम्मती हो... वह नबी जिसने तब भी खुद कुछ करने से पहले अपने अल्लाह पर भरोसा किया जब अबराह अपने लाव-लश्कर के साथ काबा पर चढ़ाई करने और नेस्तानाबूद करने के लिए निकल पड़ा था। तब अपने सहाबाओं के कहने पर क्या कहा था नबीं ने? कहा था- काबा अल्लाह का घर है। वह खुद उसकी हिफाजत करेगा। और अल्लाह ने भी देखो क्या किया? उसने अबाबील चिड़ियों को भेज दिया। जिन्होंने अपनी चोंच से अबराह की फौज पर इतनी कंकर बरसाई कि वह पूरी तरह हलाक और बर्बाद हो गई। अल्लाह ने इस घटना का ज़िक्र कुरान में भी किया है। लेकिन यह उससे सीख नहीं लेंगे। लेंगे भी कैसे? कुरान पढ़ा हो तब ना!
ख़ैर, सच पूछो तो इसमें इन लोगों का भी कोई कुसूर नहीं है। सारा कुसूर इन मोलवी-मुल्लाओं का है जो तोंद निकाले बनियों की तरह मसनद पर बैठे रहते हैं। इन्होंने इस्लाम को कभी लोगों के बीच पहुंचने ही नहीं दिया। उसे मस्जिदों और मदरसों में बंद कर लिया। जो इनकी अय्याशी के अड्डे बने हुए हैं। इन्होंने लोगों को मूर्ख बनाए रखा और उनके हाथों से कलम और किताबों को छीन लिया। उन्हें सिर्फ सुनने के लिए कहा। बोलने के लिए नहीं। जानते हो क्यो? क्योंकि उन्हें पता है कि अगर लोग उनसे सवाल करेंगे तो एक दिन में ही उनकी सारी दुकान चौपट हो जाएगी। उन्हें बोरिया-बिस्तर बांधकर भागना पड़ेगा। लोगों को उनकी ज़रुरत नहीं रहेगी। वह खुद ही दीन से मुल्लातिक अपने सब काम कर लेंगे। मोलानाओं की उन्हें कोई ज़रुरत नहीं रहेगी। इसलिए उन्होंने सवाल करने को इस्लाम के खिलाफ ठहरा दिया। कहा कि इस्लाम में सवाल करने की मनाही है। जो लोग सवाल करते हैं वह कुरान और शरियत की हिदायतों पर उंगली उठाते हैं। और जो लोग अल्लाह की किताब पर सवाल उठाएंगे अल्लाह उन्हें कभी माफ नहीं करेगा। अल्लाह के खौफ़ से इन्होंने लोगों की बोलती बंद कर दी। इससे लोग हर दीनी (धार्मिक) काम के लिए इनके मोहताज हो गए। इसका इन्होंने भरपूर फायदा उठाया। अपने मन-मुताबिक कुरान-ओ-हदीस की व्याख्या की और लोगों को अपने-अपने गिरोह (समुदाय, फिरकों) में बांट लिया। और उनके अंदर एक ऐसा कट्टर इस्लाम ठूस दिया जो हकीकत में इस्लाम था ही नहीं। अब वे गैरों से तो क्या अपने से ही नफरत करने लगे हैं। अब वे मुसलमान नहीं रहे। बल्कि शिया-सुन्नी, बहावी-देवबंदी-बरेलवी और अहमदिया और हज़ारा हो गए। अब तुम्हीं बताओं जो इंसान, इंसान से ही नफरत करता हो वह खुदा से कभी मौहब्बत कर पाएगा? कभी नहीं। और यह सब जो तुम आज की दुनिया में हलचल देख रहे हो वह सब इसी नफरत का नतीजा है। ये मोलवी पहले इन्हीं लोगों के खिलाफ मिंबर पर बैठकर बयानबाजी करते थें। उनके खिलाफ फतवे जारी करते थे। लेकिन अब तुम देखना यही मुल्ले इन्हें... इस उत्पाद के बाद हीरो बना देंगे। उन्हें सच्चे मुसलमान का खिताब देंगे और जन्नत में उनकी जगह पक्की कर देंगे। जैसे जन्नत खुदा की नहीं इनके बाप की जागीर हो।
अब्बूजी ने और भी इसी तरह की बहुत सी बातें कही थी। लेकिन अब वह मुझे याद नहीं है। पहले तो मैं उनकी इस पूरी व्याख्या को सरसरी तौर लेता रहा और इसे उनके धर्म से हुए मोहभंग के रूप में देखता रहा। लेकिन उस घटना ने, जो स्वीडन के कार्टूनिस्ट द्वारा पैगंबर मोहम्मद (स.) के कार्टून बनाने पर पूरी दुनिया में घटी थी। जिसने मुस्लिम दुनिया के साथ पूरे यूरोप और एशिया महाद्वीप में भी तहलका मचा दिया था। हर तरफ अफरा-तफरी का माहौल था। अमीर लोगों ने कार्टूनिस्ट के सिर की कीमत तय कर दी थी। किसी ने हाथी बराबर सोना देने वादा किया था तो किसी ने ट्रक भर रुपये देने का ऐलान किया था। लोग सड़कों पर उतर आए थे। हर कोई धरना-प्रदर्शन में भाग ले रहा था। सभाएं बुला जा रही थीं। मीटिंगें रखी जा रही थीं। लोग सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन कर रहे थे। मोलाना लोग इनकी अगुवाई कर रहे थे और मन को वश में कर लेने वाली धार्मिक तकरीर कर रहे थे। औरतें रो रही थीं और मर्द लाल आखें निकाले हुए गुस्से में धधकते किसी को भी कच्चा चबा जाने के लिए तैयार थे। इन्हीं प्रदर्शनों में उसने, जिसने पलक झपकते ही पूरे इलाके को एक कर दिया था और हर किसी को सड़कों पर निकलने के लिए मजबूर कर दिया था। उन्हीं प्रदर्शनों में उसने खुद को आग लगा दी थी। वह... नाटा और भूरा लड़का, जो कुर्ता-पायजामा पहनता था और सिर पर टोपी रखता था वही बड़े मिया था। बड़े मिया... जो अपने उस साहसिक कारनामें के बाद पूरे इलाके का हीरो बन गया था। उसकी सलामती के लिए मोलानाओं ने दुआएं की थीं, इज्तमें किए थे, जुलूस निकाले थे, घर-घर में उसके लिए नमाज़े पढ़ी गई थी और सदके दिए गए थे। वही बड़े मिया था। बड़े मिया... जिसकी बीती ज़िंदगी कुछ कम रोचक नहीं थी।
बड़े मिया का जन्म भी आम मुसलमानों की तरह एक निम्न मध्यम-वर्गीय परिवार में हुआ था। वह अपने ग्यारह भाई-बहनों (तीन बहनें और आठ भाई) में सातवें नंबर पर था। बचपन से ही वह भूरा और थोड़ा नाटा था। चलते वक्त वह अपने दोनों हाथ पीछे बांध लेता और गर्दन झुका कर चलता। मोहल्ले वाले उसे इस अंदाज़ में चलते देखकर खिलखिलाकर हँस पड़ते और कहते- देखो, कैसे बड़े मिया की तरह चल रहा...।किसी ने यह बात बस ऐसे ही मज़ाक में ही कही थी। लेकिन उसके एक बार ऐसा कहने के बाद लोग उसे बड़े मिया के नाम से ही पुकारने लगे थे। कुछ समय बाद लोग उसका असली नाम भूल गए और वह बड़े मिया के नाम से मशहूर हो गया।
बड़े मिया के वालिद मजदूर थे। इसलिए वह अपने किसी भी बच्चे को पढ़ने नहीं भेज पाए  थे। लेकिन उन्होंने बड़े मिया को पढ़ने भेजा था... मदरसे में।
पर मदरसे जाने के कुछ दिन बाद ही वह वहां से भाग आया था। उसने अपना कुर्ता ऊपर उठा कर नीली पीठ दिखाते हुए कहा था कि मोलाना उसे हर रोज़ बेंत से मारता है... कपड़े धुलवाता है... बर्तन साफ करवाता है और रात को पैर दबाने के लिए बुलाकर साथ में सोने के लिए कहता है। मना करने पर फिर मारता है। यह सुनकर बड़े मिया के वालिद मदरसे गए थे और मोलाना के साथ खूब मारपीट करके लौटे थे।
इसके बाद कुछ दिन बड़े मिया घर ही रहा था। शाम को पढ़ने के लिए मस्जिद चला जाता था। लेकिन कुछ दिनों बाद ही उसे फिर से एक दूसरे मदरसे में भेज दिया गया। हालांकि इस बार उसके वालिद ने वहां जाकर खुद अच्छी तरह से तहकीकात की थी और जब वह मदरसे और उसके मोलाना के व्यवहार से अच्छी तरह आश्वस्त हो गए तब वह खुद ही बडे मिया को वहां छोड़ने गए थे।
इस बार बडे मिया ने कोई शिकायत नहीं की थी। नए मदरसे में वह जम गया था। एक बार मदरसे में जाने के बाद फिर वह वहां से पूरे पांच साल बाद निकला था... हाफिज-ए-कुरान बनकर। हाफिज़-ए-कुरान होने पर उसे मोहल्ले की ही मस्जिद में मोअज्जिन (अजान देने वाला) बना दिया गया। लेकिन उसके मोअज्जिन बनने के कुछ दिनों बाद ही एक समस्या खड़ी हो गई थी। मस्जिद में जहां पहले पच्चीस से तीस हजार चंदा आता था वहीं वह अब पांच से दस हजार हो गया था। लोग समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर पैसा जा कहां रहा है? गल्ले की चाबी तो मोतमीन (मस्जिद का जिम्मेदार) के पास रहती है। सारा हिसाब-किताब वही देखते हैं। अचानक गल्ले में से पैसे कैसे कम होने लगे? कहीं लोगों ने चंदा देने तो बंद नहीं कर दिये? फिर एक दिन किसी ने बड़े मिया को लोहे के तार से गल्ले का ताला खोलते हुए पकड़ लिया। लोगों ने बड़े मिया को खूब मारा और उसे मस्जिद से निकाल दिया। उसके जाने के बाद जब छानबीन की गई तो मस्जिद से ओर भी बहुत सी कीमती चीज़ें गायब थीं। मसलन- लोहे की बाल्टियां, कीमती दरिया, मुसल्ले और लोटे।
मस्जिद से निकाले जाने के बाद बड़े मिया ने अपना हुलिया ही बदल लिया। उसने दाढ़ी कटवा ली और पैंट-शर्ट पहनने शुरु कर दिये। वह मजदूरी करने लगा। लेकिन लोगों ने उसे बहुत बार जवान लड़कों और गैर शादीशुदा मर्दों के साथ ईख के खेतों और खाली, खंडहर मकानों में जाते देखा था। लोगों ने इस पर उसे- मर्द रंडी कहना शुरु कर दिया था। फिर जब यह बात धीरे-धीरे पूरे शहर में फैल गई तो शहर-ए-इमाम ने उसके खिलाफ इस्लाम से खारिज होने का फतवा जारी कर दिया। फतवा जारी करते हुए इमाम ने कहा था- अगर यहां इस्लामिक हुकूमत होती तो मैं तुझे संसागर करने का हुक्म देता और तुझ पर पहला पत्थर खुद मारता... बदज़ात कहीं के। तेरे हरकतों से शैतान भी शरमा जाए... तुझे तो जहन्नम में भी जगह नहीं मिलेगी। ये तो अल्लाह का करम है कि तू अभी तक सही-सलामत खड़ा है... वरना तुझे तो हलाक-ओ-बर्बाद कर देना चाहिए था... दफा हो जाओ मेरे नज़रों के आगे से... शैतान की औलाद।
भरे मजमे में इस तरह जलील होने के बाद बडे मिया मानो गायब ही हो गया। कई महीनों तक वह कहीं दिखाई ही नहीं दिया। और जब लोग उसे भूलने लगे तो वह फिर न जाने कहां से उनके सामने आ खड़ा हुआ। अपने पहले वाले रूप में। वह चार महीने की तब्लीगी जमात से लौटा था। सफेद कुर्ता-पायजामा पहने। उसकी दाढ़ी भी बढ़ आई थी और चेहरा भी दीनी-नूर से चमक रहा था। उसको इस बदले रूप में देखकर लोग हैरान तो जरूर हुए थे। लेकिन उन्होंने उसकी पिछली ज़िंदगी को भूलकर उसे फिर से अपना लिया था। वह उसका फिर से सम्मान भी करने लगे थे। उससे अदब से मिलते थे। पर यह सब ज्यादा दिन नहीं चल सका। धीरे-धीरे उसकी पुरानी आदते अपना रंग दिखाने लगी। वह फिर से छोटी-मोटी चोरी करने लगा और फिर एक दिन वह मस्जिद के इमाम साहब के साथ गुसलखाने में बिना कपड़े के पकड़ा गया। इसके बाद इमाम साहब को भी मस्जिद से निकाल दिया गया और बड़े मिया को भी हमेशा के लिए इस्लाम से खारिज कर दिया गया।
इस्लाम से खारिज किये जाने के बाद बड़े मिया फिर से मजदूरी करने लगा। वह अपना खाली वक्त शराबियों और जुआरियों के साथ बिताने लगा। लोग अक्सर उसे शराबखानों और जुए के अड्डों पर अपने नए साथियों के साथ देखते। उनके कपड़े मैल से भरे होते, बाल चिकट होते और महीनों तक न नहाने की वजह से उसके शरीर से बदबू आती रहती। वह अपने साथियों से घिरा बैठा रहता और गप्पे हांकता रहता।
और फिर वह घटना घटी जिसने पलक झपकते ही सबको पक्का-सच्चा मुसलमान बना दिया। उस घटना से जिन लोगों ने ज़िंदगी में कभी खुदा को सज्दा भी नहीं किया था वह भी सिर पर टोपी रखने लगे थे और जिन लोगों ने कभी स्कूल का मुंह तक नहीं देखा था वह भी सुबह उठते ही अखबारों में नज़रे गड़ा लेते। अखबार, जो कार्टूनिस्ट के खिलाफ मुस्लिम और यूरोपिय देशों में हो रहे प्रदर्शनों की तस्वीरों से पटे रहते और उनमें मुस्लिम धर्मगुरुओं और राष्ट्रध्यक्षों के बयान छपे होते। शहर में भी पूरे जोर-शोर से प्रदर्शन हो रहे थे। बाजार में, सड़कों पर और मोहल्ले की गलियों में भी जहां देखो वहीं नारे लगाते प्रदर्शनकारी दिखाई देते थे। पूरा आसमान या नबी और नारे-ए-तकबीर... अल्लाह-हु-अकबर के नारे से फटा जाता था। इसी बीच शहर-ए-इमाम ने ईदगाह मैदान में एक जलसा (सभा) बुलाया था। जलसा क्या था लोगों का एक सैलाब था। एक ऐसा सैलाब कि जिधर देखो उधर सिर ही सिर नज़र आते थे। टोपियों से ढके सिर। पता नहीं इतने लोग कहां से निकल आए थे। ऐसा लगता था यह ईदगाह का वह मैदान नहीं है जिस पर हम साल में दो बार नमाज़ पढ़ते थे, बल्कि हसर का मैदान है... जहां कयामत के दिन अल्लाह पूरी दुनिया के लोगों को इकट्ठा करेगा। जलसे में इमाम साहब ने दिल चीर देने वाली तकरीर की थी। लोगों के दिल मोम की तरह पिघल गए थे और उनकी आँखों से आँसूओं का दरिया बह निकला था। हर चेहरा गीला था और उनकी दाढ़ियों से आँसू ऐसे टपक रहे थे जैसे सर्द सुबह में पेड़ों के पत्तों से ओस की बूंदे गिरती है।
जलसे के बाद जुलूस निकला था। किसी अनहोनी के डर से शहर के चप्पे-चप्पे पर पुलिस थी। और जहां जुलूस खत्म होना था वहां फौज की एक पूरी बटालियन खड़ी थी। जुलूस पूरे जोश-ओ-खरोश और आसमान को भी दहला देने वाली आवाज़ के साथ नारे लगाता हुआ ईदगाह के मैदान से निकलकर सड़कों पर चल निकला। हर ओर, या नबी... या नबी।
नारे-ए-तकबीर... अल्लाह-हु-अकबर।
जो हमारे रसूल को बुरा कहेगा, मारा जाएगा।
ये आशिक़-ए-रसूल, अपनी जान पर खेल जाएगा।
नारे गूंज रहे थे और बेहद धार्मिक और अपने पैगंबर से बेपनाह प्यार करने वाले मुसलमानों के इस जुलूस का नेतृत्व कौन कर रहा था? कोई ओर नहीं बल्कि बड़े मिया। वह बड़े मिया जिसे शहर-ए-इमाम ने अपने फतवे से इस्लाम से खारिज़ कर दिया था। वह सबसे आगे चलते हुए माइक में अपनी पूरी ताकत से नारे-ए-तकबीर कहता और पीछे चल रहे लातादाद लोगों का हुजूम अल्लाह-हु-अकबर कहकर उसका साथ देता।
अपने मकाम पर पहुंचते ही जुलूस बेकाबू हो गया। उत्तेजित भीड़ हाथापाई पर उतर आई... भीड़ एक कदम आगे बढ़ती तो पुलिस दो कदम पीछे हटती। पुलिस दो कदम आगे बढ़ती तो भीड़ एक कदम पीछे हटती। पुलिस ने अपनी पूर्व तैयारियों के बलबूते हालात को काबू में करने की पूरी कोशिश की। लेकिन फिर वह सब घटा गया... जिसकी किसी को उम्मीद भी नहीं थी। बड़े मिया ने भीड़ में से किसी के हाथ से मिट्टी के तेल की केन छीनकर अपने ऊपर उडेल ली... ओर इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता... माचिस की एक तीली जली और आग एक गोल  की शक्ल में भट्टी की तरह जल उठी... लोग पीछे हट गए... पुलिस वाले आगे बढ़ गए... आग बुझाने के लिए ।
अस्पताल के सामने तिल रखने की भी जगह नहीं थी... डॉक्टर्स जवाब दे चुके थें। अब कुछ नहीं किया जा सकता... लोग दहाड़ मार-मार कर रो रहे थें... कोई छाती पीट रहा था तो कोई सुबक रहा था... कुछ लोग एक दूसरे को सूर-ए-फातिहा पढ़ने के लिए कह रहे थें।
मैंने आज तक किसी के जनाज़े में इतने लोगों को हिस्सा लेते नहीं था... आलिम या किसी अल्लाह के वली के जनाज़े में भी नहीं। बडे मिया के जनाज़े में इतने लोग थें कि उसे कंधा तो बहुतों ने दिया था लेकिन शायद ही किसी ने कदम उठाया हो... कंधों ही कंधों पर उसका जनाज़ा मस्जिद के सामने से उठकर कब्र तक पहुंच गया था।
मिट्टी दिए जाने के बाद शहर-ए-इमाम ने बड़े मिया के लिए दोनों हाथ फैलाकर दुआ मांगी थी। उन्होंने अल्लाह से कहा था- या अल्लाह एक प्यारा और नेक बंदा तेरे घर आ रहा है... तू उसकी मगफिरत फरमा... उसके गुनाहों को माफ कर और उसे जन्नत में आलिशान मकाम नसीब फरमा... वह तेरे प्यारे नबी का सच्चा उम्मती है... उसने तेरे प्यारे नबी के इश्क में अपनी जान दी है... तू उसे ज़ाहिदों में शुमार फरमा... उस पर जहन्नम की आग हराम फरमा... और जन्नत दे... मेरे मोला!”
लोगों ने एक साथ गूंजती आवाज़ में कहा- आमीन।
मोलाना ने फिर बोलना शुरु किया और लोगों ने फिर आमीन कहा। लोगों की भीड़ में खड़ा हुआ मोलाना की इस रुह कंपा देनी वाली आवाज़ को सुनकर मैं सोच रहा था कि यह वही इमाम है जिसने बडे मिया को शैतान की औलाद कहा था और उसे जहन्नम में भी जगह नहीं मिलने की बद्दुआ दी थी। और आज वही इमाम उसे अल्लाह का नेक बंदा और नबी से इश्क करने वाला सच्चा उम्मीत बता रहा है...! सब मोलानाओं का खेल है... जिसे चाहे जहन्नम में भेज दें और जिसे चाहे जन्नत में! लेकिन हकीकत में किसे पता है कि कौन कहां जाता है...! मोलानाओं को भी नहीं!!!

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नाम- शहादत।
संप्रीति- रेख़्ता (ए उर्दू पोएट्री साइट) में कार्यरत।
शिक्षा- बी.ए. (विशेष) हिंदी पत्रकारिता, दिल्ली विश्वविद्यालय।
मोबाईल- 7065710789
दिल्ली में निवास।

कथादेश, नया ज्ञानोदय, कथाक्रम, स्वर्ग विभा, समालोचना, जनकृति, परिवर्तन और ई-माटी आदि पत्रिकाओं में कहानियां प्रकाशित।



हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad